समय! ठहरो सूर्य कुछ कहता है
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विष्णुदत्त नागर समय! तुम मेरे अनुगामी हो इसलिए मैं अपने मन की व्यथा सुनाता हूँ- मुझ पर ताप बढ़ने के कारण बिजली की कमी होने का दोष मढ़ा जाता है, लेकिन यह भुला दिया जाता है कि मेरी गर्मी या सौर ऊर्जा से बिजली बनाकर समस्या का समाधान निकाला जा सकता है। मैंने अपनी तपती गर्मी के साथ बिजली पैदा करने की अनंत संभावनाएँ भेंट की हैं, लेकिन लोग आँखें मूँदकर केवल मुझे और उस गर्मी को कोसते हैं।अपनी महत्ता और अन्य देशों में मेरा सम्मान करने वाले देशों की उपलब्धि का वर्णन करने के पूर्व मैं यह बता दूँ कि मुझे विशेष दुःख इस बात का है कि भारत में मेरा प्रतिष्ठित स्थान होना चाहिए। तुम्हारी चलन गति के आधार पर देश के पंचांग बनते हैं, तिथि-त्योहार निर्धारित होते हैं। सूर्यवंशी भगवान राम की गाथा का बड़ी श्रद्धा से बखान किया जाता है।तुम्हें याद दिला दूँ कि जब श्रीराम युद्ध से थककर चिंता करते हुए रणभूमि में खड़े थे, |
| ऊर्जा की जरूरतें इतनी बढ़ी हैं कि 2012 तक हमें ऊर्जा उत्पादन की मौजूदा क्षमता में 100 गीगावाट की बढ़ोतरी करनी होगी। भारत में दुनिया की 17 प्रतिशत आबादी निवास करती है, लेकिन हमारे पास जैव ईंधन का मात्र 0.8 प्रतिशत भंडार है |
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तब अगस्त्य मुनि ने श्रीराम को उपदेश दिया था कि वे मेरे नाम के मंत्रों के द्वारा पूजन करें। मेरी धुरी के इर्द-गिर्द पृथ्वी तो चक्कर लगाती ही है, साथ ही चंद्रमा भी मुझसे प्रकाशवान होता है। मैं सदैव कर्मशील हूँ और मैंने कभी फल की इच्छा नहीं की। लेकिन मेरे में छिपी संभावनाओं और विद्युत वरदानों में सरकार और लोगों की अधिक दिलचस्पी नहीं। आज नहीं तो कल भारत के घरों को 'विद्युती सूर्यवंशी' होना पड़ेगा।प्रसंग है गत सप्ताह दिल्ली में संपन्न हुई ऊर्जा समन्वय समिति का, जहाँ प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहनसिंह ने संबोधन में एक ओर सौर ऊर्जा मिशन स्थापित करने, सौर ऊर्जा लालटेन और सौर ऊर्जा का प्रयोग अन्य क्षेत्रों में प्रसार करने की बात कही, वहीं दूसरी ओर हर स्तर पर बिजली की बचत करने पर जोर दिया। मुझे संतोष हुआ कि देर से ही सही, ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए सौर ऊर्जा की ओर सरकार का ध्यान गया।ऊर्जा की जरूरतें इतनी बढ़ी हैं कि 2012 तक हमें ऊर्जा उत्पादन की मौजूदा क्षमता में 100 गीगावाट की बढ़ोतरी करनी होगी। भारत में दुनिया की 17 प्रतिशत आबादी निवास करती है, लेकिन हमारे पास जैव ईंधन का मात्र 0.8 प्रतिशत भंडार है। जैव ईंधन प्रदूषण फैलाने के कारण हानिकारक है और तेल आयात पर 77 अरब डॉलर से भी अधिक का बढ़ता खर्च हमारी अर्थव्यवस्था पर असहनीय बोझ बन गया है।तेल निर्यातक देशों के संगठन (ओपेक) के अध्यक्ष साकिब खलील ने चेतावनी दी है कि आगामी महीने में तेल की कीमत 170 डॉलर प्रति बैरल के इर्द-गिर्द स्तर पर पहुँच सकती है। अभी हम सभी प्रयत्नों के बावजूद ऊर्जा जरूरतों का केवल 3 प्रतिशत हिस्सा ही परमाणु स्रोतों से हासिल करते हैं।यदि हम अमेरिका से परमाणु करार कर भी लें तो पवन, जल विद्युत के अलावा परमाणु ऊर्जा का उत्पादन कम से कम दस गुना बढ़ाना होगा। इसलिए सौर ऊर्जा समेत नवीन और अक्षय ऊर्जा के रूप में अन्य स्रोतों को बढ़ावा देने के अलावा हमारे सामने कोई अन्य विकल्प नहीं है। साथ ही यह ध्यान रखना होगा कि सौर-ऊर्जा के उत्पादन के सबसे कीमती सिलीकॉन पदार्थ की आपूर्ति बढ़ाई जाए।उल्लेखनीय है कि ऑस्टे्रलिया और अमेरिका समेत दुनिया के कई देशों में सौर ऊर्जा से बिजली बनाने का काम शुरू हो गया है। अकेले अमेरिका में बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 350 मेगावाट से अधिक क्षमता के सौर बिजलीघर स्थापित किए गए। 2010 तक काम करने वाले 850 मेगावाट का एक बड़ा बिजलीघर स्थापित किया जा रहा है। कैलीफोर्निया और बोस्टन में सौर ऊर्जा के बड़े-बड़े पैनल स्थापित किए गए हैं।राष्ट्रपति पद के डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार बराक ओबामा का वादा है कि वे सत्ता में आने के बाद 2025 तक बिजली की माँग का 25 प्रतिशत सौर ऊर्जा से पूरा करने की योजना की शुरुआत करेंगे। यद्यपि हमारे देश में ऊर्जा के अक्षय स्रोतों जैसे सूरज, हवा, जैविक कचरे के इस्तेमाल को प्रोत्साहित करने की जिम्मेदारी केंद्र सरकार के नवीन और अक्षय ऊर्जा मंत्रालय पर है, लेकिन इस ओर छिटपुट पहल ही होती है और बड़े बिजलीघर बनाने का काम ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।
हमारे वैज्ञानिकों और अभियंताओं ने इसके लिए आवश्यक तकनीक और उपकरण आदि भी तैयार कर लिए हैं, लेकिन सरकारों की उदासीनता के कारण इनका कोई इस्तेमाल नहीं कर रहा है। मंत्रालय ने गुड़गाँव-फरीदाबाद मार्ग पर ग्वाल पहाड़ी पर 50 किलोवाट क्षमता का सौर तापीय बिजलीघर अवश्य बनाया है, लेकिन ग्रिड के लिए सौर ऊर्जा से बिजली बनाने की ओर किसी प्रकार की कोशिश नहीं की गई।कुछ दक्षिणी राज्यों ने दिलचस्पी अवश्य दिखाई है और तमिलनाडु ने अपने अधिकारियों को सौर ऊर्जा बिजलीघर के बारे में जानकारी लेने के लिए जर्मनी और स्पेन भेजा है। लेकिन मंथर गति से चलने वाले घिसे-पिटे सरकारी रवैए ने केवल औपचारिकता मात्र ही निभाई है। नवीन और अक्षय ऊर्जा मंत्रालय ने सौर ऊर्जा से बिजलीघर बनाकर ग्रिड को बिजली देने में सरकार की ओर से वित्तीय प्रोत्साहन देने की घोषणा अवश्य की है।इस योजना के अनुसार फोटो वाल्टाइक तरीके से बिजली बनाने पर प्रोत्साहन की दर 12 रुपए प्रति यूनिट और सौर ताप से बिजलीघर बनाने पर 10 रुपए प्रति यूनिट की दर होगी। लेकिन हैरत की बात यह है कि उसमें यह शर्त डाल दी गई है कि सौर बिजलीघर की क्षमता एक मेगावाट से कम नहीं होनी चाहिए।मुझे दुःख इस बात का है कि मेरी अनंत क्षमता होते हुए भी मध्यप्रदेश में निविदा प्रणाली के माध्यम से टेंडर मँगवाकर कम बोली की आड़ में मेरी गुणवत्ता का क्षरण किया। छत्तीसगढ़ ने घरेलू सौर ऊर्जा पर प्रति लीटर 40 रुपया व व्यावसायिक उपयोग पर 25 रुपया सबसिडी देकर कर्तव्य की इतिश्री कर ली।समय! तुम जानना चाहोगे कि मेरा उपयोग कैसे हो और मेरी लागत लाभ का क्या ढाँचा होगा? मेरी ऊर्जा से बिजली बनाने के लिए प्रमुख रूप से दो तरीके इस्तेमाल किए जाते हैं। पहला तरीका है फोटो वोल्टाइक या पीवी प्रणाली और दूसरा सोलर कलेक्टर के माध्यम से गर्मी या ताप का इस्तेमाल। फोटो वोल्टाइक प्रणाली के तहत धूप वाले स्थान पर सोलर पैनल लगाया जाता है, जिनके सोलर सेल सीधे ताप से बिजली बनाते हैं।अस्पतालों, होटलों, सरकारी कार्यालयों, बड़ी-बड़ी शिक्षण संस्थाओं आदि की |
| आवश्यकता इस बात की है कि इस तकनीक की कीमत कम करने के लिए और भी जोरदार अनुसंधान और प्रयास हों। मेरी गर्मी या ताप बिजली इस्तेमाल के लिए 'सोलर कलेक्टर' गर्माहट से इकट्ठा कर जिस बायलर तक पहुँचाते हैं उसकी भाप से टरबाइन चलाकर बिजली बनाते हैं |
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छत पर सोलर पेनल के उपयोग के व्यावसायिक रूप से 12 मेगावाट बिजली बनाई जा रही है। फोटो वोल्टाइक तरीके से बिजली बनाना महँगा तरीका है इसलिए लोकप्रिय नहीं हो पा रहा है, लेकिन जिस तरह तेल कंपनियाँ ढाई लाख करोड़ का घाटा उठाकर तेल बेच रही हैं और सरकार 112 करोड़ से अधिक के तेल बॉण्ड जारी कर चुकी है, उनको देखते हुए फोटोवोल्टाइक या पीवी प्रणाली को सबसिडी देना जनता और सरकार दोनों को सस्ता पड़ेगा।आवश्यकता इस बात की है कि इस तकनीक की कीमत कम करने के लिए और भी जोरदार अनुसंधान और प्रयास हों। मेरी गर्मी या ताप बिजली इस्तेमाल के लिए 'सोलर कलेक्टर' गर्माहट से इकट्ठा कर जिस बायलर तक पहुँचाते हैं उसकी भाप से टरबाइन चलाकर बिजली बनाते हैं। सोलर पैनल से बिजली बनाने के स्थान पर यह तरीका सस्ता है।अब केंद्र और राज्य सरकार का दायित्व है कि वे देश के बड़े-बड़े भवनों की छतों को बिजलीघरों में कैसे बदलते हैं। शुरू में यह तो किया ही जा सकता है कि ऊँची इमारतों में ऊर्जा संरक्षण कोड जरूरी हो। इसके लिए ऊर्जा की कम खपत के साथ-साथ पर्यावरण की भी रक्षा होगी और प्रदूषण कम फैलेगा।ऊर्जा संरक्षण कोड के तहत बहुमंजिला इमारतों में सौर ऊर्जा का प्रयोग किए जाने के साथ-साथ कम ऊर्जा खपत वाले उपकरण, कम ऊर्जा खपत वाली लिफ्ट, बल्ब और ऊर्जा संरक्षण के लिए सेंसर आदि का प्रयोग अनिवार्य होना चाहिए। अगर समझदारी के साथ रणनीति अपनाई जाए तो सौर ऊर्जा से देश का विद्युत संकट बहुत हद तक दूर हो सकता है।