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मीडिया, भाषा और साहित्य
'अ टीचर बाई आक्युपेशन', 'कपलीट परफेक्शन', 'एकर्स ऑफ लैंड', 'फ्यूचर प्रोस्पेक्ट्स', 'द लेटेस्ट अपटुडेट इन्फॉर्मेशन', 'अ शॉर्ट ऑफ टाइम' एब्सल्यूटली एक्स्हास्टेड' जैसे शब्द प्रयोग देखकर मुस्कराया जा सकता है, लेकिन हिन्दी अखबारों में भाषाई नवाचार के नाम पर कोड स्विचिंग की अनावश्यकताओं की भरमार जरूर दिखती है, जहाँ एक हास्यास्पद रूप से वर्णसंकर भाषा की वाचालता है।

पहले भी खिचड़ी भाषा चलती थी और खिचड़ी भाषाओं की अपनी आप्तता भी रहती आई है,
  यह ध्यान दीजिए कि हमारे यहाँ शब्द ब्रह्म है, शब्द माथा नहीं है। शब्द इल्यूजन नहीं है- अल्टीमेट रियलिटी है। शब्द के साथ एक क्रीड़ा कवि भी करता है- उसे क्रीड़नक कहा भी इसलिए गया, लेकिन शब्द के साथ क्रीड़ा और बात है, सचाई से खिलवाड़ और बात      
लेकिन जो चीज अब देखी जा रही है वह खिचड़ी नहीं, चटनी भाषा है। वह कोई पथ्य नहीं है, वह तात्कालिक मौज-मजे के लिए हमें मिल रहा फास्ट फूड है, जो हमें अल्प समय के लिए ही सही, एक चकितावस्था में ला खड़ा करता है। आज से ठीक सौ साल पहले जब महावीर प्रसाद द्विवेदी जब सरस्वती निकालते थे तो वे भाषा के अनुशासन की चाबुक चलाते थे।


वे शब्द के प्रति इतने संवेदनशील थे कि एक प्रसिद्ध लेखक ने जब 'काबुल में भी गधे मिलते हैं' शीर्षक से लेख भेजा तो उन्होंने उसका शीर्षक बदलकर 'काबुल में सब घोड़े नहीं मिलते' कर दिया। शाब्दिक संस्कारों के प्रति इन संवेद्यताओं की क्या आज कोई वकत नहीं? कि आज भी 21वीं सदी के अवबोध के साथ ही सही, लेकिन एक महावीर प्रसाद द्विवेदी के पुनरावतार की बहुत जरूरत है। जो पूछे कि क्यों हिन्दी अखबारों के स्तंभ अँगरेजी में होने जरूरी हो गए हैं?

'यूथ गैलरी', 'फर्स्ट पर्सन' जैसे स्तंभ क्यों हिन्दी अखबारों की किसी दयनीय रूप से दरिद्र मानसिकता का पता देते हैं? क्या यूथ गैलरी इस बात से अधिक युवा हो जाती है कि वहाँ किसी युवा की ओर से लिखा जाए कि वह शू परचेस करने के लिए मार्केट गया? यह एक नुमाइशी 'हिंडी' है, जिसका लक्ष्य आम ग्रामवासिनी भारती से खुद को पृथक और विशिष्ट दिखाने का आडंबर रचना है।

यह हिन्दी में हो रहा मिश्रण नहीं है, यह हिन्दी में हो रहा संक्रमण है, जहाँ कई बार क्रिया या कारक में ही हिन्दी बची हुई रहती है। यानी इस 'हिंडी' में अपनी जड़ों के प्रति कोई भक्ति है तो वह विभक्ति में ही शेष रह गई है। क्या यह आधुनिक हिन्दी मानस में पड़ गई किसी दरार, किसी विभाजन, किसी विभक्ति का प्रतीक बनकर सामने आई है?

एक यदि अर्थव्यवस्था ग्लोबल हो जाने की हड़बड़ी में है तो क्या शब्द व्यवस्था भी ग्लोबल हो जाने की उसी हड़बड़ी से स्पर्धा कर रही है। साहित्यिक पत्रिकाओं में भी ऐसी दूषणग्रस्त हिन्दी मिलेगी। एक प्रसिद्ध अखबार की साहित्य वार्षिकी में मैं पढ़ता हूँ, 'नवीन हर रोमांटिक पोएट्स को खारिज कर चुका था'- 'हर' के साथ बहुवचन का क्या मतलब है?

लेकिन भाषा के और दूसरे भी आयाम हैं, जिन्हें अपनाकर मीडिया अपनी तरह का अस्थैर्य देश में रचता है। मीडिया को 'सॉफ्ट' शब्दावली टीआरपी-अनुकूल शायद लगती ही नहीं। इसलिए उसकी भाषा युद्ध और संग्राम की भाषा बन गई है। यहाँ संगीत का भी विश्वयुद्ध होता है, यहाँ तो क्रिकेट में बड़ी आग है, यहाँ हर चीज में बवाल होता है- पानी पर, आग पर, यहाँ क्रिकेट जैसे जेंटलमनली खेल को घमासान की तरह दर्ज करवाया जाता है। यह एक विचलित, डाँवाडोल, डगमग भारत की तस्वीर है- अशांत और असहज भारत की।

यह ध्यान दीजिए कि हमारे यहाँ शब्द ब्रह्म है, शब्द माथा नहीं है। शब्द इल्यूजन नहीं है- अल्टीमेट रियलिटी है। शब्द के साथ एक क्रीड़ा कवि भी करता है- उसे क्रीड़नक कहा भी इसलिए गया, लेकिन शब्द के साथ क्रीड़ा और बात है, सचाई से खिलवाड़ और बात। यदि भाषा यह खिलवाड़ करती है तो वह अपने लिए अश्रद्धा की इकालॉजी खुद तैयार करती है। जब खूँटे से बँधी हुई पत्रकारिता को एम्बेडेड जर्नलिज्म का नाम दिया जाता है तो क्या यह नहीं प्रतीत होता कि शब्द अपना धुआँ खुद रच रहा है।
(लेखक मप्र के जनसंपर्क आयुक्त हैं।)
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