- मनोज श्रीवास्तव
कोई घटना किसी चीज का 'होना' मात्र नहीं है, वह घटना एक रिश्ता भी है- उस 'होने' और एक प्रतीक-प्रणाली के बीच का रिश्ता। यह ठीक है कि घटना की कवरेज इस बात से भी निर्धारित होती है कि अखबार और उसके लक्ष्य-समूह के बीच प्रतीक-व्यवस्था किस फ्रेम में सक्रिय होती है, लेकिन इन दोनों चीजों के कारण ही पत्रकारिता का ही नहीं, बल्कि साहित्य का भी शुरुआती मसौदा बन जाती है।
घटना और उसके अर्थान्वयन के बीच में यदि कल्पना साहित्य में सक्रिय होती है | | तथ्यों, आइडिया, ले-आउट के स्तर पर वहाँ जो नवाचार दिखते हैं, भाषा के स्तर पर क्या वैसी रागात्मकता दिखती है? बल्कि अँगरेजी के कई समाचार-पत्रों में जितने रोचक श्लेष दिखते हैं, उतने अँगरेजी चैनलों और हिन्दी समाचार-पत्रों व चैनलों में नहीं दिखते |
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तो पत्रकारिता में भी होती है, किंतु खबर के लिए किसी घटना के चयन के भी निहितार्थ होते हैं, जो उस अखबार या चैनल की पॉलिटिकल इकॉनॉमी का ही नतीजा नहीं होते, बल्कि उस अखबार की संस्कृति, आंतरिक संस्कृति का फलित भी होते हैं।
वे उस वायु का भी पता देते हैं, जो उस प्रतिष्ठान के रंध्रों में प्रवाहित होती है। मीडिया के विभिन्न प्रतिष्ठानों में प्रतिस्पर्धा और संक्रमण की प्रवृत्तियाँ भी देखने को मिलती हैं। कई बार एक्सक्लूसिव के लिए स्पर्धा करने वाले छूत के रोग से बुरी तरह ग्रस्त नजर भी आते हैं, लेकिन सावधानी से देखें तो खबर के प्रति बर्ताव की शैली की विशिष्ट सांस्थानिकताएँ चिन्हीं जा सकती हैं।
मीडिया, भाषा और साहित्य तीनों संप्रेषण के मुद्दे पर अपनी-अपनी तरह एकाग्र होते हैं, लेकिन साहित्य की तुलना में मीडिया के समक्ष बड़ी चुनौती है किसी 'कथ्य' को डि-इन्टेलेक्चुअलाइज करने की। साहित्य प्रज्ञा का जो संभार लेकर सहजता से चल लेता है, मीडिया कोशिश करता है, उसे लघुत्तम समापवर्तक तक लाने की, लोएस्ट कॉमन डिनॉमिनेटर तक लाने की।
इस क्रम में मीडिया भाषा के साथ अपने तरह के प्रयोग करता है। मीडिया की भाषा साहित्यिक भाषा की तरह अलंकरण का बोझ लेकर नहीं चलती, न ही वह अकादमिक भाषा की तरह बौद्धिकता का बोझ ढोती है, लेकिन कागज और ओंठों के बीच की दूरी कम करने के चक्कर में मीडिया का भाषा-प्रयोग नवाचार भी करता है। यदि भाषा कृत्रिम होगी तो कोई भरोसा नहीं कि पाठक उस खबर को भी नकली, गढ़ी गई नहीं मानेगा।
इसलिए मीडिया में भाषा का सवाल बहुत जरूरी हो जाता है। भाषा हमारे संस्कार गढ़ रही होती है। कई लोगों को भाषा मात्र एक साधन लगती है और उस पर बहुत बारीकियाँ निकालना एक व्यर्थ का व्यायाम, लेकिन बात बारीकी की ही नहीं है, शब्द की अपनी धूरी की है।
उस धूरी से स्खलित होना खबर की विश्वसनीयता का भी किसी हद तक क्षरण करता है। यह वैसा ही है जैसे गणित में दशमलवों का या ड्रग्स के प्रिस्क्रिप्शंस में ग्रेन्स का छोटा-सा अंतर, जो लगता अमहत्वपूर्ण है, लेकिन थोड़ा-सा भी फर्क या तो रॉकेट प्रक्षेपण को विफल कर देगा या किसी मरीज की जान पर बन आएगी।
मैं कई बार मीडिया में मरे हुए जुमलों का जुलूस देखता हूँ या उन्हें एक तरह की 'पॉपस्पीक' की आत्मरति में डूबे हुए देखता हूँ तो मुझे यह नहीं लगता कि उद्घोषक हड़बड़ी में है, मुझे लगता है कि वह जैसे थक चला है, उसकी कल्पना शक्ति भी थक चली है। वह शीघ्रता नहीं है, थकान है और यह दृश्य बड़ा विचलित करता है कि इतने युवा उद्घोषक या उद्घोषिका इस बाली उमर में थक गए।
उस उमर में जिसमें निराला, पंत वर्ड्सवर्थ भाषा के एक नए तेवर के साथ आए थे, इन बाल गोपालों को रटे-रटाए क्लिश की अतिशयोक्तियाँ ही हत्थे चढ़ीं। क्लिश से क्लेश होने लगा है। साहित्य में तो जब प्रतीकों के देवता कूच कर जाते हैं और अभिव्यक्ति की कलई उतर जाती है तो व्यंजना की एक नई शैली को खोजने की व्यग्रता एक युगांतर ही ले आती है, लेकिन मीडिया में फिकरेबाजी की वही चिर-परिचित कल्लादराजी जारी रहती है।
तथ्यों, आइडिया, ले-आउट के स्तर पर वहाँ जो नवाचार दिखते हैं, भाषा के स्तर पर क्या वैसी रागात्मकता दिखती है? बल्कि अँगरेजी के कई समाचार-पत्रों में जितने रोचक श्लेष दिखते हैं, उतने अँगरेजी चैनलों और हिन्दी समाचार-पत्रों व चैनलों में नहीं दिखते। मैं यह नहीं कह रहा कि अँगरेजी अखबारों की भाषा सब अच्छी ही है।
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