पूर्वरंग स्तंभ के तहत धरती आबा शीर्षक से नाटककार हृषिकेश सुलभ ने बिरसा मुंडा को अनूठे ढंग से याद किया है। एक बानगी देखिए : 'लौटकर आऊँगा मैं, ...जल्द ही लौटूँगा मैं अपने जंगलों में, अपने पहाड़ों पर। ...मुंडा लोगों के बीच फिर आऊँगा मैं। ...तुम्हें मेरे कारण दुःख न सहना पड़े इसलिए माटी बदल रहा हूँ मैं। ...उलगुलान ख़त्म नहीं होगा। आदिम खून है हमारा। ...काले लोगों का खून है यह। भूख...लांछन...अपमान...दुःख...पीड़ा ने मिल-जुलकर बनाया है इस खून को। इसी खून से जली है उलगुलान की आग। यह आग कभी नहीं बुझेगी ...कभी नहीं। ....जल्दी ही लौटकर आऊँगा मैं।‘ हकू शाह से पीयूष दईया की बातचीत भी ध्यान खींचती है।
सबद की विशेषता यह भी है कि इसमें वैविध्यपूर्ण सामग्री है। सिनेमा को लेकर विनोद अनुपम का स्तंभ सेवेंटीएमएम शुरू किया गया है। इसमें विनोदजी ने हिंदी फिल्मों के अच्छे आलोचक के अभाव पर विचारोत्तेजक टिप्पणी की है और हिंदी फिल्म निर्माताओं-निर्देशकों के व्यावसायिक सोच पर भी चोट की है। आशा है इस स्तंभ में आगे और अच्छी टिप्पणियाँ पढ़ने को मिलेंगी।
कवि की संगत कविता के साथ स्तंभ के तहत चंद्रकांत देवताले का आत्मकथ्य और दो कविताएँ दी गई हैं। देवतालेजी हिंदी के बेहतरीन कवियों में से एक हैं और उनका आत्मकथ्य एक बार फिर उनके आवेग, उनकी चिंता और प्रतिबद्धता को बताता है। वे अपने आत्मकथ्य एक लंबी चीख की तरह में लिखते हैं - कविता लिखते हुए मैं घिरा हुआ महसूस करता हूँ। उस मुसाफिर की तरह जो यादों, सपनों और अपने यथार्थ के जख्मों का असबाब लिए प्लेटफॉर्म छोड़ चुकी ट्रेन पकड़ने दौड़ता है और जैसे-तैसे सवार हो जाता है।
सबकुछ को बार-बार कहना, जबकि उजागर है वह चीथड़ा-चीथड़ा होकर चमकते हुए इस महोत्सव में, अजीब लगता है। जैसे अपने जीवनानुभवों की नदी को कविता की नाव में लाद कर ले जाना कठिन है, वैसे ही है यह। पर यह भी लेखक की नियति है। नि:सहाय गवाही देते ख़ुद को भी गुनाहगार की तरह देखता हूँ। सुनता हूँ अपने को उत्सवों-गुणगान-कीर्तन के बोगदे में एक लम्बी चीख की तरह...
वे स्त्री पर लिखी अनेक बेहतरीन कविताओं के लिए जाने जाते हैं। यहाँ तुम्हारी आँखें कविता है जिसमें वे कहते हैं - पृथ्वी के उस तरफ़ से एकटक देखती तुम्हारी आँखें मेरे साथ कुछ ऐसे ही करिश्मे करती हैं कभी-कभी चमकती हैं तलवार की तरह मेरे भीतर और मेरी याद्दाश्त के सफों में दबे असंख्य मोरपंख उदास हवाओं के सन्नाटे में फड़फड़ाते परिंदों की तरह छा जाते हैं उस आसमान पर जो सिर्फ़ मेरा है
इसके अलावा अनुराग वत्स ने कृष्ण बलदेव वैद, जाँ निसार अख्तर, कुँवरनारायण आदि पर अपनी टिप्पणियाँ दी हैं। एक नए कवि तुषार धवल की कविता को अच्छे तरीके से प्रस्तुत किया है।
सबद पर आना और पढ़ना हिंदी की बेहतरीन रचनात्मकता से रूबरू होना है। एक ऐसे समय में जब समाज लगातार साहित्य की तरफ पीठ करके बैठा नकली परिदृश्य पर टकटकी लगाए मगन है तब सबद हमें एक असली और जरूरी परिदृश्य को देखने-समझने का एक आत्मीय और विनम्र मौका देता है। विनोदकुमार शुक्ल की कविता से ही शब्द लेकर कहूँ तो सबद के इस हाथ बढ़ाने को जानने की जरूरत है।
सबद का यूआरएल है http://vatsanurag.blogspot.com
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