क्या जीवितों की तुलना में मृतकों से संवाद आज ज़्यादा संभव और ज़्यादा सार्थक हो गया है ? इन्हें लिखते हुए-- खासकर गुजरात के मृतकों और मोहन थपलियाल पर-- मुझे बहुत पीड़ा हुई, कभी रोया भी, लेकिन लिख चुकने के बाद लगा जैसे मेरा कोई बोझ उतर गया है, मैं भारहीन-सा हो गया हूँ और वह एक नैतिक मूल्य मुझमें भी समा गया है जिसका प्रतिनिधित्व ये प्रतिभाएँ करती हैं। इस तरह मृतक मेरे, 'कन्सायन्स-कीपर' हैं। मृतकों का अपना जीवन है, जो शायद हम जीवितों से कहीं ज़्यादा सुंदर, उदात्त और मानवीय है। इतने अद्भुत लोग, और जिंदगी में उन्होंने कितना कुछ झेला और वह भी बिना कोई शिकायत किए। जो नहीं हैं मैं उनकी जगह लेना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ वे मेरे मुँह से बोलें।
यह अंश उनकी जल्द आ रही किताब कवि का अकेलापन से लिया गया है और इसमें कवि के सादे लेकिन मार्मिक गद्यकार की धीमी लेकिन जरूरी करुणा को सुना जा सकता है। इसमें दया नहीं, दीनता नहीं और आत्मदया तो बिलकुल भी नहीं है बल्कि करुणा को एक प्रतिरोध में बदल देने की ताकत है।
सबद में कुछ कॉलम ध्यानाकर्षी हैं, जैसे कोठार से बीज के तहत हिंदी के अप्रतिम कवि शमशेर बहादुर सिंह का वह ख्यात गद्य दिया गया है- टूटी हुई बिखरी हुई जिसमें कवि की गद्यकारी का जलवा साफ देखा जा सकता है। अनकहा कुछ स्तंभ के तहत प्रभात रंजन ने बिल ब्रायसन की किताब शेक्सपियर : द वर्ल्ड एज स्टेज के बहाने इस नाटककार के इर्द-गिर्द फैले मिथ और कुहासे पर बात की है और कुछ महत्वपूर्ण जानकारियाँ दी हैं।
एक कवि एक कविता स्तंभ के तहत केदारनाथ सिंह की कविता बर्लिन की टूटी दीवार को देखकर और कुँवरनारायण की कविता अमीर खुसरो पर यतींद्र मिश्र की टिप्पणी दी है। ये दोनों कविताएँ भी हैं और इन दो पोस्टों को पढ़कर सहज ही कहा जा सकता है कि यतींद्रजी ने क्रिटिकल जार्गन से बचकर इन दोनों कविताओं के मर्म को बहुत ही आत्मीय ढंग से विश्लेषित करने की कोशिश की है बल्कि कहा जाना चाहिए कि यह एक आलोचक की टिप्पणी नहीं एक सहृदय कविता प्रेमी की टिप्पणियाँ हैं, जो हमें सीधे काव्य मर्म तक ले जाती हैं।
सबद पर विदेशी लेखकों द्वारा अपनी रचना प्रक्रिया पर लिखे गए लेखों के अंशों के अनुवाद भी हैं। इनका बहुत ही अच्छा अनुवाद उपन्यासकार-कहानीकार राजी सेठ ने किया है। इसमें रचना प्रक्रिया पर गेब्रियल गार्सिया मार्खेज, इतालो काल्वीनो, हेनरी मिलर, आक्टोवियो पाज, मिलान कुंदेरा, इवान मेक्वान के विचार पढ़े जा सकते हैं। राजी सेठ ने रिल्के द्वारा अपने युवा मित्र को लिखे पत्रों का बेहतरीन अनुवाद किया है। यहाँ राजीजी एक बार फिर रिल्के के अनुवाद के साथ मौजूद हैं।
इसके अलावा रिल्के पर बढ़त स्तंभ के तहत युवा रचनाकार गिरिराज किराड़ू ने रिल्के की कृति जीवन-विलाप एक मित्र के लिए शीर्षक के लिए अपनी रचना दी है। इसमें रिल्के की छाया में अपनी रचनात्मकता को लगभग काव्यात्मक रूप से अभिव्यक्त किया है। इसमें कविता से कथा और कथा से कविता के इलाके में जाने की एक प्रीतिकर आवाजाही देखी जा सकती है। |