????? <http://vatsanurag.blogspot.com/2008/05/blog-post.html> हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था व्यक्ति को मैं नहीं जानता था हताशा को जानता था इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया मैंने हाथ बढ़ाया मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ मुझे वह नहीं जानता था मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था हम दोनों साथ चले दोनों एक-दूसरे को नहीं जानते थे साथ चलने को जानते थे यह कविता हिन्दी के मूर्धन्य कवि विनोदकुमार शुक्ल की है। सबद की शुरुआत इन्हीं शब्दों से।
ब्लॉग दुनिया में कई तरह के ब्लॉग हैं। सबद उनमें नया और अलग है। नया इसलिए नहीं कि यह दो महीने पहले शुरू किया गया है, नया इस अर्थ में है कि इसमें अनुराग वत्स ने अपने को भरसक पीछे रखकर हिंदी की तमाम विधाओं में सक्रिय सर्जनात्मक प्रतिभाओं को गरिमामय ढंग से प्रस्तुत किया है। और अलग इस मायने में है कि इसमें एकदम नए स्तंभों के जरिए श्रेष्ठ रचनात्मकता से रूबरू कराने का एक विनम्र प्रयास है।
अनुराग की मंशा उनके द्वारा लिखी गई इस छोटी सी टिप्पणी में समझी जा सकती है कि गुफ्तगू उन सबसे है जिनका एक घर सबद निरंतर में भी है। जरिया सबद है। गरज इतनी कि लोगों का उससे सम्बन्ध और घना हो। ख़ुद भी लिखता रहूँगा और कोशिश रहेगी कि उन समर्थ रचनाकारों की नई-पुरानी रचनाओं को भी सबद के माध्यम से आपके सामने लाऊँ, जिसका होना हमें कई तरह से समृद्ध करता है।
और यदि आप सबद की पोस्ट पर गहरी नजर डालेंगे तो जान जाएँगे कि सचमुच यहाँ ऐसी नई-पुरानी रचनाएँ हैं, जो हमें कई तरह से समृद्ध करती हैं। उन्होंने सबद के जरिए जो हाथ बढ़ाया है, उस हाथ बढ़ाने को जानते हुए हिंदी के कई रचनाकारों ने अपना हाथ बढ़ाकर उन्हें जो रचनात्मक सहयोग दिया है, उससे यह सबद समृद्ध हुआ है और सबद के जरिए हम सब। सबद में हिंदी की बहुत सारी विधाओं की सुंदर और मार्मिक झलकियाँ देखी जा सकती हैं। इसमें कविता है, कविताओं पर टिप्पणियाँ, कवि हैं अपनी कविताओं और आत्मकथ्य के साथ, नाटककार हैं, डायरियों के अंश हैं, किताबों पर बातें हैं, रचना प्रक्रिया से लेकर अनकहा कुछ तक है।
इसकी सबसे ताजा पोस्ट में अनुराग ने हिंदी के ख्यात ------मंगलेश डबराल की डायरी के अंश दिए हैं। इन अंशों को पढ़कर मंगलेशजी की चिंताओं का पता चलता है। इस अंश पर गौर कीजिए-
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