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हताशा और बुझते सवाल?
पहली और दूसरी आजादी के दौर में देश का नेतृत्व कारागार में कैद था और आजादी के लिए लड़ने की प्रेरणा स्वतःस्फूर्त रूप से देश के मन में पैदा करता था। आज हमारे देश का तथाकथित राष्ट्रीय नेतृत्व आतंकवाद को ढाल बनाकर अंतर्मन में डरा हुआ एक ऐसा रोबोटिक नेतृत्व बन गया है, जो सुरक्षा इंतजाम के तंत्र की जकड़ में आज स्वेच्छा से कमांडो की कैद में है और उसमें ही बना रहना चाहता है।

देश का नेतृत्व चाहे सत्ता पक्ष का हो या विपक्ष का, यदि वह कमांडो की कैद में न हो तो माँग करता है कि हमारे लिए कमांडो की कैद की व्यवस्था की जाए अन्यथा अवाम को लगेगा ही नहीं कि हम महत्वपूर्ण राष्ट्रीय नेता हैं। आज देश का राष्ट्रीय नेतृत्व प्रत्यक्ष रूप से जनजीवन में घुल-मिल नहीं सकता।

वह एक लोकतांत्रिक देश में खुलेआम घूम नहीं सकता, जनता को दर्शन दे सकता है, जनता के दर्शन कर सकता है, पार्टी द्वारा प्रायोजित रैली के मंच से देखता है और किसी तरह ढोकर लाई भीड़ उन्हें दोनों हाथ हिलाते हुए या अभिवादन करते निहार भर सकती है।

पहली और दूसरी आजादी की लड़ाई का नेतृत्व करने वाली दोनों धाराओं में
  आज देश में आपातकाल नहीं है फिर भी लोग अपने विचार, जीवन और व्यवहार में लाचार, असहाय और चुप क्यों हैं। सब जानते-बूझते आर्थिक वैचारिक गुलामी में जीवन का संगीत क्यों खोज रहे हैं      
साठ साल के लोकतंत्र में देश के स्वाधीनतापरस्त लोकतांत्रिक मूल्यों के बजाय विकास के नाम पर बाजार की मुख्य धारा की वाहक बनकर स्वेच्छा से कमांडो की कैद में क्यों प्रसन्न है, यह आज के दिन का यक्ष प्रश्न है, जिसका उत्तर आज के काल का एक ऐसा बुझता हुआ शगल है जिसे चिंगारी बनाने में हम सब विचारवान या निरक्षर, धनवान या निर्धन, सत्तारूढ़ या तथाकथित असत्तारूढ़ (क्योंकि विपक्ष की भूमिका भारत के लोकतंत्र में खरमोर की तरह लुप्तप्राय होती जा रही है।) पक्ष या आम जनता को जो पहल लोक जीवन के स्वाधीन मूल्यों और आजादी की मशाल जलाए रखने के लिए करनी चाहिए वह लोक उत्तरदायित्व लाचारी और चुप्पी के खतरनाक उदासीन भाव में बदल चुका है।


आपातकाल में हमारी सतही शांति ने लोकमानस में नागरिक आजादी और लोकतांत्रिक मूल्यों की जो ज्वाला फैलाई थी, उसी का नतीजा था कि 19 माह के आपातकाल ने देश के मानस में बदलाव का भाव एवं एक ऐसा दृश्य रचा था, जिसमें हमारे स्वाधीनता आंदोलन के मूल्यों और आजादी के लिए तड़प का लोकभाव जागृत हुआ था। हम सब की सामूहिक उदासीनता ने उस भाव को आज आपातकाल न होते हुए भी एक लाचार यथास्थिति में बदल दिया है।

आज देश में आपातकाल नहीं है फिर भी लोग अपने विचार, जीवन और व्यवहार में लाचार, असहाय और चुप क्यों हैं। सब जानते-बूझते आर्थिक वैचारिक गुलामी में जीवन का संगीत क्यों खोज रहे हैं। देश राजनीतिक रूप से स्वतंत्र होने के बाद भी व्यवस्था और अधोसंरचना की गुलामी को ही नशे की तरह क्यों अपनाता जा रहा है।

हमारी आजादी, लोकतंत्र और संविधान की जीवनी शक्ति के प्रति हमारी राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक उदासीनता एक अरब से ज्यादा लोकशक्ति वाले देश के नागरिकों के मन में स्वाधीन होने के उत्साह के बजाय अकेलेपन को अनमनापन और नैराश्य भाव निरंतर फैलकर परिस्थिति के आगे बेबसी का लाचारी भाव हमारे लोक जीवन के हर क्षेत्र में क्यों आ रहा है, इसका समाधानकारी उत्तर खोजना ही आज के काल की सबसे बड़ी चुनौती है।
(लेखक आपातकाल में 19 माह जेल में नजरबंद रहे।)
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