- अनिल त्रिवेदी
भारत के साठ साला लोकतंत्र में आज आजादी को लेकर वैसा भाव लोगों और संस्थानों के मन और संचालन में नहीं दिखाई देता जैसा भाव भारत की आजादी की लड़ाई लड़ते समय लोगों या देश के मन में था। आज के काल में आजादी के लिए जीवन की कुर्बानी का भाव हमारे मन में नहीं आता।
साठ साल से देश आजाद है, लोकतंत्र है, संविधान आम आदमी के साथ खड़ा है पर आजादी, लोकतंत्र और संविधान का किसी भी रूप में कमजोर होना या छिन जाना हमारे मन में वह जज्बा पैदा नहीं करता जिसको लेकर हमारे पुरखों ने आजादी, लोकतंत्र एवं संविधान के लिए अपनी जिंदगी को खपाया था।
आज का दिन आजाद भारत में चुनी हुई सरकार द्वारा आजादी का गला घोंटकर आपातकाल के नाम पर देश के लोकतंत्र और आजादी के मूलभूत मूल्यों को छीनने के दुराग्रह को भारत में लादने की कोशिश का दिन है। 26 जून 1975 को घबराई हुई राजसत्ता ने देश में आपातकाल लगाने की घोषणा कर आजाद भारत में स्वाधीनता को कैद कर दिया था।
हजारों कार्यकर्ता-नागरिक देश की आजादी के दौर में 1942 की अगस्त | | 1977 में आपातकाल की पृष्ठभूमि में हुए आम चुनावों ने भारतीय सत्ता की राजनीति के सत्ता सूत्रों को ही पूरी तरह से उलट-पलट दिया। जो आजादी के बाद से निरंतर सत्ता में थे वे विपक्ष हो गए और जो आजादी के बाद से निरंतर विपक्ष में थे वे सत्तारूढ़ हो गए |
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क्रांति के अग्रदूत तथा 1974-75 के संपूर्ण क्रांति के आंदोलन के लोकनायक जयप्रकाश के नेतृत्व में मीसा के तहत देशभर की जेलों में नजरबंद कर दिए गए। प्रेस सेंसरशिप लागू हुई, संविधान के मूल अधिकार कैद हो गए, न्यायपालिका पंगु हो गई, न वकील, न अपील, न दलील।
आजाद देश में आजादी मनमानी की गुलाम हो गई। 1974 से भारत के लोकतंत्र, सत्ता संचालन एवं देश-समाज की जनसमस्याओं के निराकरण की अनदेखी कर चलाई जा रही मनमानी के विकल्प के रूप में देश की लोकशक्ति को जागृत कर भ्रष्टाचार, महँगाई, कुशिक्षा और बेरोजगारी जैसे आम जनजीवन के सवालों को उठाकर संपूर्ण क्रांति का जो अभियान देशभर में लोकनायक के नेतृत्व में चला उसने आजाद भारत में फिर से आजादी, लोकतंत्र एवं प्रेस की आजादी और लोकजीवन के सवालों के प्रति वैसा ही भाव लोकमानस में खड़ा किया था, जैसा भाव स्वाधीनता की लड़ाई के दौरान देश के मानस पटल पर उदित हुआ था।
आजादी की लड़ाई में विदेशी दासता या गुलामी के खिलाफ लोक जागरण हुआ था तो आपातकाल की पृष्ठभूमि में देशी राजसत्ता द्वारा देश के ही लोगों की वैचारिक भिन्नता और कार्यप्रणाली को कुचलने की तत्कालीन सत्ता की मंशा उजागर हुई थी। बुद्ध, महावीर और गाँधी के आजाद देश में 'सच कहना अगर बगावत है तो समझो हम भी बागी हैं', का उद्घोष लोगों के लिए आजादी का वैसा ही मंत्र बन गया था जैसा अगस्त क्रांति में 'करो या मरो।'
1977 में आपातकाल की पृष्ठभूमि में हुए आम चुनावों ने भारतीय सत्ता की राजनीति के सत्ता सूत्रों को ही पूरी तरह से उलट-पलट दिया। जो आजादी के बाद से निरंतर सत्ता में थे वे विपक्ष हो गए और जो आजादी के बाद से निरंतर विपक्ष में थे वे सत्तारूढ़ हो गए।
आजादी के आने के तीस साल बाद दूसरी आजादी के योद्धाओं की सरकार बनी और आज देश में आपातकाल के बाद तीस से भी अधिक साल का लंबा समय बीत गया। इन तीस सालों में भारत की राजनीति और लोकतंत्र में सत्ता के कई प्रयोग हुए और आज भी चल रहे हैं। आजादी के बाद तीस साल तक एक ही दल का एकछत्र राज पूरे देश में बना रहा, पर दूसरी आजादी की लड़ाई के तीस साल बाद आज देश की राजनीति का सच यह है कि किसी भी दल के एकछत्र राज का जमाना इतिहास की वस्तु बन गया।
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