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आक्रोश और आंदोलन का दौर
जनता पार्टी उनकी इसी सोच का परिणाम थी। चुनाव में भागीदारी के पक्ष में कुछ ऐसे भी नेता थे, जो यह मानते थे कि चुनाव तो नहीं जीतेंगे, परंतु चुनावों के नाम पर श्रीमती इंदिरा गाँधी उन्हें जेल से रिहा कर देतीं।

इस समय भी देश की आम जनता का दृढ़ निश्चय था कि जनतंत्र की रक्षा करना है तथा व्यवस्था को बदलना है। इसीलिए 1977 का आम चुनाव देश की जनता ने अपनी सक्रियता, शक्ति व बलबूते पर लड़ा। हम लोगों के गाँवों में पहुँचने के पहले ही जनता जनता पार्टी की इकाई बना चुकी थी तथा तन-मन-धन, सर्वस्व लगाकर अपने नेताओं का इंतजार कर रही थी। जनता सक्रिय थी, नेता निष्क्रिय।

जनता जीत की लड़ाई लड़ रही थी, नेता हार का दाँव लगा रहे थे। गरीब से गरीब पढ़े-लिखों से ज्यादा अशिक्षित गाँव वालों ने अपना योगदान दिया तथा जनता पार्टी को चुनाव जिताकर पहले केन्द्र सरकार में फिर देश के बड़े हिस्सों में सूबे की सरकारों में पहुँचा दिया, परंतु जनता पार्टी के केन्द्र या राज्यों की सरकारों ने देश को निराश किया। राशन के दाम कम करने के लिए उन्होंने बाजार को नियंत्रित करने की बजाय केवल भंडारों के दरवाजे खोले।

कुछ समय के लिए शकर व राशन खुले बाजार में सस्ती दर पर मिल गया,
  आपातकाल की यादें केवल जख्म कुरेदने से सार्थक नहीं होती, वरन्‌ हमें देश की जनता के मन में परिवर्तन की भूख जगाकर देश को जड़ता रूपी संग्रहणी की बीमारी से मुक्त कराना होगा, तभी हलचल होगी तथा परिवर्तन की हवा के झोंके आ सकेंगे      
परंतु यह घटना केवल 'रात्रि के सुखद सपने जैसी ही साबित हुई।' नींद टूटते ही सपना टूट गया। भ्रष्टाचार मिटाने, रोजगार देने, शिक्षा नीति, चुनाव सुधार आदि मुद्दों पर जनता पार्टी की सरकारों ने काम तो दूर, विचार तक नहीं किया। परिणामस्वरूप थोड़े ही समय में जनता पार्टी बिखर गई।


आपातकाल और आज के समय का एक बड़ा फर्क यह है कि तब देश के आम मानस में यह विश्वास था कि हम सरकारें बदल सकते हैं तथा इस सत्ता परिवर्तन से अवश्यंभावी रूप से व्यवस्था परिवर्तन भी होगा। नव नेता हताश व निराश थे, जनता उत्साहित थी।

अब गत तीन दशकों के सत्ता परिवर्तनों के अनुभवों से देश की जनता हताश व निराश है कि कुछ नहीं हो सकता, कुछ नहीं होगा, सबको देख लिया आदि। पूँछ के नीचे सभी मादा हैं- नेताओं की प्रतिस्पर्धा त्याग व कुर्बानी की नहीं वरन्‌ मतदाताओं के मतों के जेब काटने की कुशलता की हो गई है। कौन कितने बढ़िया ढंग से कितने नकली लुभावने नारों से मतदाताओं को बेहोश करके मत ले सकता है। वही सफल नेता व सत्ताधीश बनेगा।

इस राष्ट्रीय निराशा के दौर ने देश को संग्रहणी का बीमार बना दिया है। जिस प्रकार संग्रहणी के बीमार की भूख मर जाती है, उसी प्रकार देश की जनता की परिवर्तन की भूख मर गई है। आपातकाल की यादें केवल जख्म कुरेदने से सार्थक नहीं होती, वरन्‌ हमें देश की जनता के मन में परिवर्तन की भूख जगाकर देश को जड़ता रूपी संग्रहणी की बीमारी से मुक्त कराना होगा, तभी हलचल होगी तथा परिवर्तन की हवा के झोंके आ सकेंगे, जो सत्ताधीशों को आपातकालीन दौर के कार्यक्रमों को लागू करने के लिए प्रेरित करेंगे।
(लेखक आपातकाल में बंदी बनाए गए थे।)
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