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आक्रोश और आंदोलन का दौर  Search similar articles
- रघु ठाकुर

लोकनायक जयप्रकाश नारायण सहित लगभग 2 लाख लोगों, जिसमें अधिकांशतः तत्कालीन राजनीतिक दलों (समाजवादी पार्टी-भारतीय जनसंघ-भारतीय क्रांतिदल संगठन कांग्रेस आदि) के नेता-कार्यकर्ता शामिल थे, को गिरफ्तार कर जेलों में डाला गया था। लगभग 21 माहों बाद मार्च 77 के आसपास लोकसभा चुनावों की घोषणा के बाद ही रिहा किया गया था।

यद्यपि बहुतेरे बंदी आपातकाल की घोषणा के कुछ ही समय पश्चात सरकार को माफीनामा देकर राजनीति से संन्यास लेकर रिहा हो गए थे। आपातकाल की समाप्ति की घोषणा तो लोकसभा चुनाव के पश्चात तथा श्रीमती इंदिरा गाँधी की पराजय के बाद ही हुई। प्रतिवर्ष 25-26 जून को आपातकाल की याद में देश भर में अनेक संस्थाओं द्वारा आयोजन किए जाते हैं तथा आपातकाल के हालात की भर्त्सना व विधवा प्रलाप होता है।

मैं आपातकाल में पूरे समय बंदी रहा हूँ, परंतु मैं, उस अरण्य रोदन की बजाय देश के तत्कालीन व वर्तमान हालात पर तुलनात्मक अध्ययन करना जरूरी समझता हूँ। 1974 में गुजरात के छात्रों एवं नौजवानों के द्वारा महँगाई के विरुद्ध तथा गुजरात के नवनिर्माण का आंदोलन चलाया गया था।

जो कालांतर में संपूर्ण गुजरात की जनता का आंदोलन बना तथा श्रीमती गाँधी की सरकार को गुजरात की चिमनभाई पटेल सरकार को बर्खास्त करना पड़ा था। महँगाई व भ्रष्टाचार के विरुद्ध इस छात्र युवा व जनआंदोलन से जेपी इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने इसी तर्ज पर बिहार में आंदोलन शुरू किया तथा सार्वजनिक रूप से कहा कि गुजरात के नौजवानों ने मुझे राह दिखाई है। उपरोक्त पृष्ठभूमि का जिक्र मैंने इसलिए किया है, ताकि आपातकाल के पूर्व व आपातकाल के दिनों के वातावरण को समझा जा सके।

जेपी के संपूर्ण क्रांति आंदोलन का उद्देश्य देश की व्यवस्था परिवर्तन का था।
  आपातकाल की घोषणा मूलाधिकारों के निलंबन, प्रेस व अदालतों पर नियंत्रण तथा लगभग 2 लाख लोगों की गिरफ्तारी ने देश के आम जनमानस को झकझोर दिया था। जन अभिव्यक्ति पर बंदिशों से देश भयभीत था, परंतु मनों के अंदर आक्रोश पनप रहा था      
इसीलिए जेपी ने संपूर्ण क्रांति को स्व. डॉ. लोहिया की सप्त क्रांति के मुद्दों के समतुल्य बताया था। सप्त क्रांति के इन मुद्दों में रंग भेद-वर्ण भेद-लिंग भेद-अर्थ भेद तथा राज भेद की समाप्ति के साथ-साथ विकेन्द्रीकरण एवं विश्व नागरिकता-निशस्त्रीकरण शामिल थे। आपातकाल के पूर्व के 3-4 वर्ष, देश में जनांदोलनों के उभार के वर्ष थे।


1974 की राष्ट्रव्यापी रेल हड़ताल, विश्वविद्यालयों के प्रांगणों में शिक्षा नीति के बदलाव, रोजगार तथा भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन, महँगाई व नियंत्रित राशन प्रणाली के विरुद्ध आम जनता का आक्रोश व आंदोलन, मजदूर-कर्मचारियों के आंदोलन सरकार व प्रशासनतंत्र के दमन व अन्याय के विरुद्ध आंदोलन, ये देश में आम घटनाएँ थीं।

आपातकाल की घोषणा मूलाधिकारों के निलंबन, प्रेस व अदालतों पर नियंत्रण तथा लगभग 2 लाख लोगों की गिरफ्तारी ने देश के आम जनमानस को झकझोर दिया था। जन अभिव्यक्ति पर बंदिशों से देश भयभीत था, परंतु मनों के अंदर आक्रोश पनप रहा था। जनता बंधित व डरी थी, पर निराश नहीं थी।

नेता भयभीत, निराश व हताश थे, परंतु जनता समय के इंतजार में थी तथा 'तूफान के पहले की शांति' की मुद्रा में थी। इसीलिए जब भारत सरकार ने लोकसभा के आम चुनावों की घोषणा की तो अनेक दिग्गज नेताओं की राय चुनाव के बहिष्कार की थी, क्योंकि उन्हें लगता था कि विपक्ष को न तो प्रत्याशी मिलेंगे न जनता का सहयोग, क्योंकि भारी भय व्याप्त था।

फिर अगर विपक्षी दल चुनाव प्रक्रिया में शामिल होकर चुनाव हारे तो श्रीमती इंदिरा गाँधी की संभावित जीत को भी वैधता व जनमान्यता मिल जाएगी। चुनाव के पक्ष में जेपी थे तथा वे पूर्ण आशान्वित थे। उन्हें देश की जनता पर अथाह विश्वास था। उनका आग्रहपूर्ण आदेशात्मक निर्णय था कि चुनाव लड़ना चाहिए तथा सभी दलों को एक दल गठित कर चुनाव लड़ना चाहिए। उनका विश्वास सही निकला।
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