सर्वप्रथम अन्न, वस्त्र से स्वावलंबी बनो, भूखों को भोजन और बेकारों को काम दो, विदेशियों की परावलम्बी आधुनिकता, चमक-दमक से दूर रहना, जो देशहित में नहीं है। स्वदेशी और हमारी परंपराओं, साधनों की अनदेखी न हो।
सन् 1947 में देश स्वतंत्र हुआ। उस समय हमारा देश जिन राजनीतिक, आर्थिक परिस्थितियों से गुजरा, उन हालातों को जिन्होंने देखा, भोगा वही कह सकते हैं कि खाने-पीने, जीवन जीने के लिए आवश्यक वस्तुओं की महँगाई, अभाव क्या होता है। भारत सरकार के तत्कालीन कृषिमंत्री केएम मुंशी ने हरित क्रांति का नारा ही नहीं दिया, वरन ऐसे प्रयास किए कि अनाज के मामले में देश स्वावलंबी होता गया।
कृषि क्षेत्र में उद्योग-धंधों का विस्तार हुआ। शासकीय, अर्द्धशासकीय सेवाओं के साथ ही उपभोक्ताओं में क्रयशक्ति समय-समय के साथ बढ़ने लगी। परंतु इसके पश्चात भी आम आदमी का महँगाई ने पीछा नहीं छोड़ा। 1962-63 भारत-चीन युद्ध के पश्चात तो महँगाई ने अपना रूप दिखाना प्रारंभ किया।
2 सितंबर 1972 को 'नईदुनिया' में आम नागरिकों के लिए बढ़ती महँगाई पर मेरा लेख चर्चित हुआ था, जिसमें गेहूँ एक रुपया किलो, दालें ढाई रुपए किलो, तेल चार रुपए किलो, शक्कर चार रुपए पचास पैसे किलो, जलेबी चार रुपए किलो, घी चौदह रुपए किलो आम नागरिकों की महँगाई पर पीड़ा लिखी थी। उस समय भी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों द्वारा इन भावों की महँगाई पर इसी प्रकार शासन-प्रशासन और सत्तापक्ष पर हमले होते थे।
केंद्र और प्रदेशों में सत्ता परिवर्तनों के समय-समय पर दौर चलते रहे। | | देश की अर्थनीति अंधी गली में पहुँचकर महँगाई कम करने के विकल्पों की तलाश में जुटने लगी। यहाँ तक कि अधिकांश मीडिया महँगाई बढ़ाने वाली कंपनियों, व्यापारियों और भारतीय सभ्यता-संस्कृति को नष्ट करने वालों का दलाल बनता दिखाई देने लगा |
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चुनावों में नाना प्रकार के लुभावने वादे। कोई गरीबी हटा रहा था, तो कोई हर-खेत को पानी, हर हाथ को काम दे रहा था। विकास, निर्माण कार्यों में तालाब हों या सड़कें, उचित-अनुचित भ्रष्टाचार से संग्रह की गई संपत्ति, व्यापार, व्यवसाय और रिश्वतों का काला धन चुनावों में सेवक बनकर आने लगा। एक ही नारा दिखाई देने लगा कि, 'पैसा होगा तो कुर्सी मिलेगी, और कुर्सी होगी तो पैसा'।
निर्वाचन चाहे लोकसभा के हों या विधानसभाओं के, पंचायतों के हों या नगर पालिकाओं के, पैसा ही पैसा सत्ता पर बैठने लगा। राष्ट्र में पैसा फैलता रहा और महँगाई भी उसी के साथ चलती रही। वैश्वीकरण, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मायाजाल ने महँगाई के साथ गरीबी और अमीरी में भारी अंतर कर दिया।
देश की अर्थनीति अंधी गली में पहुँचकर महँगाई कम करने के विकल्पों की तलाश में जुटने लगी। यहाँ तक कि अधिकांश मीडिया महँगाई बढ़ाने वाली कंपनियों, व्यापारियों और भारतीय सभ्यता-संस्कृति को नष्ट करने वालों का दलाल बनता दिखाई देने लगा। वित्तमंत्री की आँकड़ेबाजी की यह दशा है कि 'कुनबा डूबा क्यों, और हिसाब ज्यों का त्यों'।
आधुनिकता की अंधी दौड़ में देश, समाज, राष्ट्रीयता और स्वदेशी भावना की सब बातें भूलकर विदेशियों की कृपा, आर्थिक चकाचौंध में गुलाम बन गए। पड़ोसी देश चीन से भी सबक नहीं लिया। इस भागमभाग में भूतल का पानी पी गए, बिजली चट कर गए। हरे-भरे जंगलों का नाश कर पर्यावरण दूषित कर डाला।
देश के बाहर से आने वाले पेट्रोल, डीजल, एलपीजी गैस ने तो महँगाई की आग में घी डालने का काम कर डाला। होना भी यही था, क्योंकि यह खनिज हमारा नहीं है। इस उत्पादन को दिन-प्रतिदिन बढ़ते भाव पर लेना मजबूरी है। हमारे वश में कुछ नहीं है। हमने आर्थिक विकासरूपी तोते की गर्दन इन विदेशी खनिज व्यापारियों के हाथ दे रखी है। हमारी सरकारें तो केवल इतना कर सकती हैं कि इनका कम से कम उपयोग करें। भविष्य के लिए अपने स्वदेशी साधन खोजें। वाणिज्य, वेट आदि के नाम पर जो टैक्स बढ़ा रखा है, उसे तो कम कर महँगाई पर राहत पहुँचा सकते हैं। (लेखक पत्रकारिता में पाँच दशक से अधिक समय से सक्रिय हैं।) |