- प्रेमनारायण नागर
भीड़ भरे बाजार से नागरिक की साइकल चोर द्वारा लेकर भागना था कि पकड़ो-पकड़ो शोर मचा। चोर पकड़ने कोई नहीं दौड़ा, खड़े-खड़े पकड़ो-पकड़ो शोर मचाते रहे। चोर भी चतुर निकला। वह भी चोर-चोर पकड़ो-पकड़ो चिल्लाता हुआ देखते-देखते सभी के सामने से साइकल लेकर भाग निकला। नागरिक सिर पकड़कर वहीं बैठ सोचने लगा, चोर को तो पकड़ना दूर रहा, लगे हैं चोर-चोर चिल्लाने।
महँगाई...महँगाई का शोर चारों ओर, जो आम आदमी महँगाई की पीड़ा से | | स्वतंत्रता के पूर्व की वह घटना भूला नहीं हूँ कि जब गेहूँ 1 रु. का 8 सेर, दालें चार आना सेर, शकर दस आना सेर, खाने का तेल चार आना सेर, नमक 1 रु. का 16 सेर, जलेबी 8 आना सेर, 25 बीड़ी का बंडल 1 आना, घी सवा रु. का एक सेर का भाव होने पर महँगे लगे थे |
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कराह रहा है वह समझ नहीं पा रहा है कि महँगाई का शोर मचाने वाले तो बहुत हैं। एक-दूसरे पर बढ़-चढ़कर आरोप-प्रत्यारोप से ऐसा प्रतीत होता है कि मानो महँगाई नारों, प्रदर्शनों, हड़तालों से भय खाकर भाग जाएगी। महँगाई का मारा आम आदमी सरकार और अर्थशास्त्रियों की आँकड़ेबाजी पढ़ता है।
मगरमच्छ के आँसुओं की भाँति राजनेताओं की नकली सहानुभूति सुनता है। सत्तापक्ष धीरज धारण करने का उपदेश देता है। जमाखोरों, सटोरियों, चोरबाजारी करने वालों, रिश्वतखोरों, निर्माण कार्यों, योजनाओं की राशि नाना प्रकार से खाने वालों को भी महँगाई पर नकली रोना रोते देखता है। प्रजातंत्र के सेवकों को देखता है कि कल क्या थे और सत्ता की मलाई खाने के बाद अब क्या हो गए। जनता की सेवा के नाम पर चुनावों में पानी की तरह बँटती शराब, धन का प्रवाह देख आम आदमी सोचने पर मजबूर होता है कि ये छद्म सेवक तो कहीं महँगाई और भ्रष्टाचार के पोषक नहीं हैं?
इन पंक्तियों का लेखक उस पीढ़ी का है, जिसने द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्व आर्थिक मंदी का आलम देखा है। वर्ष में दो-चार व्यापारियों के दिवाले निकलना आम बात थी। मैंने एक रुपए का पन्द्रह सेर गेहूँ का भाव देखा है और आज पन्द्रह रुपए का एक किलो गेहूँ खरीदकर खाना पड़ रहा है। परंतु कटु सत्य यह भी है कि एक रुपए के पन्द्रह सेर गेहूँ खरीदने को आम नागरिक के पास एक रुपया बड़ी कठिनाई से आता था। गुलाम भारत में न सिंचित खेती थी, न नौकरी अथवा काम-धंधे। रुपया कहाँ से आता?
स्वतंत्रता के पूर्व की वह घटना भूला नहीं हूँ कि जब गेहूँ एक रुपए का आठ सेर, दालें चार आना सेर, शकर दस आना सेर, खाने का तेल चार आना सेर, नमक एक रुपए का सोलह सेर, जलेबी आठ आना सेर, पच्चीस बीड़ी का बंडल एक आना, घी सवा रुपए का एक सेर का भाव होने पर महँगे लगे थे। आजादी आंदोलन के साथ-साथ हमने इन भावों का मुद्दा भी उठाया था।
स्वतंत्रता के पूर्व हमने देशी-विदेशी शासकों के शासनकाल के मध्य गरीबी, | | सन् 1947 में देश स्वतंत्र हुआ। उस समय हमारा देश जिन राजनीतिक, आर्थिक परिस्थितियों से गुजरा, उन हालातों को जिन्होंने देखा, भोगा वही कह सकते हैं कि खाने-पीने, जीवन जीने के लिए आवश्यक वस्तुओं की महँगाई, अभाव क्या होता है |
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भुखमरी, बेकारी और अकाल मृत्युओं की मुंशी प्रेमचंद के उपन्यासों, कहानियों में वर्णित घटनाओं से भी कहीं अधिक हृदयविरादक जहालत देखी है, जिसमें पति की मृत्यु पर पत्नी द्वारा अपने शरीर पर अनेक थीगड़ों से लपेटा वस्त्र कफन बनाकर डाल स्वयं नग्न रहने की घटनाएँ लिखने पर कागज का कलेजा फटता था और कलम रोती थी। वरिष्ठ नागरिक उस युग को भूले नहीं होंगे, जब दस-दस गज कपड़ा और अमेरिकन गेहूँ, मक्का लेने को कंट्रोल की दुकानों पर रात्रि तीन बजे से लाइनें लग जाया करती थीं।
8 अक्टूबर 1946 का वो दिन याद है, जब स्वतंत्रता सूर्य उदय की लालिमा दिखने लगी थी। हरिजन बस्ती नई दिल्ली में अभा चरखा संघ की बैठक में भी सम्मिलित हुआ था। गाँधीजी आए, उस समय अंतरिम सरकार के कृषिमंत्री बाबू राजेन्द्रप्रसादजी बैठक में सम्मिलित हुए थे। चर्चा में गाँधीजी ने राजेन्द्र बाबू को संबोधित करते हुए कहा था, 'याद रखना आजादी के बहुत खतरे हैं।' हमारा देश कृषि प्रधान होने के पश्चात भी कृषि और कृषकों की दशा ठीक नहीं है।
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