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जस की तस धर देंगे चदरिया?
इसके अलावा प्रधानमंत्री जरा अपने उस कथन को दोबारा याद करें कि यह सरकार एक मुद्दा सरकार नहीं है। यानी किसी एक मुद्दे पर न तो यह बनी थी और न ही उस पर गिरेगी। वास्तव में यह सरकार तो किस्मत की सिकंदर है।

  क्या यह परमाणु-बिजली अन्य बिजलियों के मुकाबले सस्ती होगी। खुद अमेरिका को वह नहीं पुसाती, हमें कैसे पुसाएगी? इस सौदे की आड़ में भारत अमेरिका का परमाणु कबाड़खाना बन जाएगा। अरबों-खरबों की परमाणु-भट्टियाँ हमारी छाती पर लाद दी जाएँ      
कांग्रेस के भाग से छींका टूटा और सरकार बन गई। सेंत-मेत में बनी सरकार, क्या सेंत-मेत में ही गिरा दी जाएगी? मुफ्त हाथ आए माल को बुद्धू आदमी भी सहेजकर रखता है। क्या वजह है कि डॉ. मनमोहनसिंह जैसा बुद्धिमान व्यक्ति उसे खो देने के लिए उतावला हो रहा है।

खोना भी किसके लिए? परमाणु सौदे के लिए! परमाणु सौदे से भारत को क्या-क्या फायदे हैं, यह बात सरकार आज तक ठीक से समझा नहीं सकी है। साधारण मतदाता की कौन कहे, देश के बुद्धिजीवी और राजनीतिक कार्यकर्ता भी संतुष्ट नहीं हैं। बिजली का एकमात्र स्रोत क्या अब परमाणु ऊर्जा ही बचा है?

क्या यह परमाणु-बिजली अन्य बिजलियों के मुकाबले सस्ती होगी। महँगी और बहुत महँगी होगी। खुद अमेरिका को वह नहीं पुसाती, हमें कैसे पुसाएगी? इस सौदे की आड़ में भारत अमेरिका का परमाणु कबाड़खाना बन जाएगा। अरबों-खरबों की परमाणु-भट्टियाँ हमारी छाती पर लाद दी जाएँगी।

इतना ही नहीं, अगर हमने कोई परमाणु-परीक्षण कर लिया तो इस कबाड़े का भी कबाड़ा हो जाएगा। सौदा खत्म हो जाएगा। क्यों करें इस तरह का सौदा हम, समझ में नहीं आता। इस तरह की घातक शर्तें भी मानें और ऊपर से अपनी विदेश नीति को अमेरिका की पिछलग्गू भी बना दें। आखिर किसलिए? क्या परमाणु ऊर्जा के बिना भारत भूखा मर जाएगा?

यदि हम कुछ ठहर जाएँ तो अमेरिका ही नहीं, परमाणु सप्लायर्स ग्रुप के सभी देश भारत की दाढ़ी में हाथ डालेंगे और हमारी शर्तों पर हमें परमाणु ईंधन और भट्टियाँ देंगे। बाजारवाद के मसीहा को भी क्या बाजार का यह नियम समझाने की जरूरत है? (लेखक भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं)
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