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जस की तस धर देंगे चदरिया?  Search similar articles
- वेदप्रताप वैदिक

मनमोहन सरकार आजकल जैसी साँसत में फँसी है, वैसी पिछले चार साल में कभी नहीं फँसी। बिना किसी संकट के वह संकट में फँस गई है। मायावती के खिसकने से यह संकट जरा अधिक सगुण हो गया है। दिल्ली में तरह-तरह की पतंगें उड़ने लगी हैं।

  'शाइनिंग इंडिया' के चक्कर में यदि अटल सरकार डूब गई तो मनमोहन सरकार परमाणु सौदे की वैतरणी में कैसे तिर पाएगी? उसके पास तो तिनके का सहारा भी नहीं है। महँगाई के डंडे उस पर अलग से बरस रहे हैं      
प्रधानमंत्री इस्तीफा दे रहे हैं, सपा कांग्रेस का समर्थन करेगी, साम्यवादी पार्टियाँ अपना समर्थन वापस ले रही हैं, भाजपा सरकार को गिरने नहीं देगी आदि-आदि कई तरंगें हवा में तैर रही हैं। इन सबका असर क्या हो रहा है? असर यह हो रहा है कि अपनी दिल्ली अब इस्लामाबाद और काठमांडू की तरह अनाथ-सी दिखाई पड़ रही है। सरकार है या नहीं, यही पता नहीं चल रहा है।

अखबारी लेखक प्रधानमंत्री के पौरुष को चुनौती दे रहे हैं। उन्हें ललकार रहे हैं कि वे कम्युनिस्टों को ललकारें। संसद भंग करें और चुनाव के मैदान में कूद पड़ें। कांग्रेस गठबंधन के सहयोगी एक-दूसरे को टटोल रहे हैं और एक-दूसरे को ठकुरसुहाती गोलियाँ थमा रहे हैं। वे वह भूल नहीं दोहराना चाहते, जो अटलबिहारी वाजपेयी ने की थी।

'शाइनिंग इंडिया' के चक्कर में यदि अटल सरकार डूब गई तो मनमोहन सरकार परमाणु सौदे की वैतरणी में कैसे तिर पाएगी? उसके पास तो तिनके का सहारा भी नहीं है। महँगाई के डंडे उस पर अलग से बरस रहे हैं। मनमोहनसिंह के प्रधानमंत्रित्व पर लगा प्रश्नचिह्न अब फैलता हुआ उनके अर्थशास्त्री होने पर भी चस्पा किया जा रहा है। ऐसे में मनमोहनसिंह का विचलित होना स्वाभाविक है।

  अगर मनमोहनसिंह यह गणित लगाए बैठे हैं कि मायावती और कम्युनिस्टों का टेका हट जाने के बाद भी उनकी सरकार टिकी रहेगी तो वे निश्चय ही दिन में सपने देख रहे हैं। यदि सपा ने साथ दे दिया तो भी उनका बहुमत सिर्फ तीन-चार सीटों का रह जाएगा      
लेकिन यह दुखद है कि भारत-अमेरिकी परमाणु सौदे को डॉ. मनमोहनसिंह व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का प्रश्न बना रहे हैं। व्यक्ति के तौर पर मनमोहनसिंह बेजोड़ हैं। उनके विरोधी भी उनके प्रशंसक हैं। वे जब हटेंगे तो लोग कहेंगे कि मनमोहनसिंह ने अपनी चदरिया बड़े जतन से ओढ़ी और उसे जस की तस धर दी। लेकिन अगर विचलित और कुपित होकर उन्होंने सरकार गिरा दी तो उन्हें कोई भी माफ नहीं करेगा, कांग्रेसी भी नहीं करेंगे। सोनिया गाँधी को यह पता है, इसीलिए वे मौन हैं।

गठबंधन के सहयोगी दल डूबते जहाज की सवारी क्यों करेंगे? जिन कम्युनिस्टों ने चार साल 'इस बुर्जुआ, पूँजीवादी और अमेरिकापरस्त सरकार' का रोते-धोते साथ दिया, वे इसके सबसे बड़े दुश्मन होंगे। केवल भाजपा ही मनमोहनसिंह की आभारी होगी, क्योंकि उसे निश्चित अवधि से छः माह या साल भर पहले ही हुकूमत करने का मौका मिल जाएगा।

अगर मनमोहनसिंह यह गणित लगाए बैठे हैं कि मायावती और कम्युनिस्टों का टेका हट जाने के बाद भी उनकी सरकार टिकी रहेगी तो वे निश्चय ही दिन में सपने देख रहे हैं। यदि सपा ने साथ दे दिया तो भी उनका बहुमत सिर्फ तीन-चार सीटों का रह जाएगा।

  क्या यह बेहतर नहीं होगा कि मनमोहनसिंह थोड़ा धैर्य रखें। अगली सरकार, जिस पार्टी की बने, वही इस सौदे को करे। वे यदि इसे बेहद महत्वपूर्ण मुद्दा मानते हैं तो इसी मुद्दे पर चुनाव लड़ें। अगर जीत जाएँ तो क्या कहने? तुरंत सौदा संपन्न करें      
लगभग सवा तीन सौ सीटों का समर्थन होने के बावजूद प्रधानमंत्री को अपनी सहयोगी पार्टियों के ब्लैकमेल के आगे कई बार झुकना पड़ा है तो जरा सोचें कि अब क्या होगा? जिन सहयोगी पार्टियों की सदस्य संख्या चार या छः है, वे भी सरकार को नाच नचाएँगी। सालभर तक ऐसी रोती-गाती सरकार चलाना क्या कांग्रेस के लिए हितकर होगा? जो कुछ बची-खुची छवि है, वह भी ध्वस्त हो जाएगी। यह सरकार का टिके रहना नहीं है, तिल-तिलकर जलते जाना है। अपनी प्रामाणिकता प्रतिदिन खोने वाली ऐसी सरकार यदि अमेरिका के साथ परमाणु सौदा संपन्ना भी कर ले तो उस सौदे में कितना दम रह जाएगा?

पहली बात तो यह कि अगले छः माह की अवधि (बुश के रहने तक) में यह सौदा बाकायदा संपन्ना भी होगा या नहीं? क्योंकि सरकार को पहले वियना की परमाणु एजेंसी से समझौता करना है, फिर परमाणु सप्लायर्स ग्रुप का आशीर्वाद प्राप्त करना है और अमेरिकी कांग्रेस (संसद) का ठप्पा भी लगवाना है। ये तीनों काम आसान नहीं हैं। ये समय साध्य हैं। यह कितना विचित्र होगा कि इस सौदे के चलते सरकार अपनी टाँग भी तुड़ा ले और सौदा संपन्न ही न हो।

क्या यह बेहतर नहीं होगा कि मनमोहनसिंह थोड़ा धैर्य रखें। अगली सरकार, जिस पार्टी की बने, वही इस सौदे को करे। वे यदि इसे बेहद महत्वपूर्ण मुद्दा मानते हैं तो इसी मुद्दे पर चुनाव लड़ें। अगर जीत जाएँ तो क्या कहने? तुरंत सौदा संपन्न करें। राष्ट्र उनका आभारी होगा। अगर हार जाएँ तो विश्वास करें कि प्रतिपक्षी दल भी आखिर संजीदा और देशभक्त लोगों से भरा हुआ है। वह उनके देशहितकारी काम को दरकिनार क्यों करेगा?

भाजपा ने तो कहा है कि कुछ संशोधनों के साथ वह इस सौदे को मंजूर करती है। उसका रवैया कम्युनिस्टों जैसा नहीं है। हाँ, मनमोहनसिंह कह सकते हैं कि बुश तो 20 जनवरी 2009 तक खिसक जाएँगे। क्या नया अमेरिकी राष्ट्रपति- खासतौर से बराक ओबामा- इस सौदे को करने देगा? इसका जवाब यह है कि अगर नहीं करने देगा तो यह सौदा जाए भाड़ में।

हम अपनी नाक क्यों रगड़ें? जितनी गरज हमको है, उससे ज्यादा अमेरिका को है। कोई राष्ट्र एक तरफा सौदा नहीं करता और अमेरिका जैसा ताकतवर और काईयाँ राष्ट्र आखिर भारत से लुटने को तैयार क्यों होगा?

भारत के माल मत्थे पर जितनी रिपब्लिकनों की लार टपक रही है, उतनी ही डेमोक्रेट्स की भी टपक रही थी। हम भूल गए कि भारत-अमेरिकी प्रेमालाप की पींगें डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने ही सबसे पहले भरी थीं। इसीलिए अब ओबामा का डर दिखाना फिजूल है
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