-कैलाश विजयवर्गीय लोकायुक्त मामले में पुलिस जाँच शुरू, विधानसभा गलियारे में निर्माण कार्यों में हुए भ्रष्टाचार की जाँच। विधानसभा ने सौंपा लोकायुक्त को विशेषाधिकार का नोटिस। सूचना आयुक्त और लोकायुक्त के बीच टकराव कायम। महामहिम और लोकायुक्त के बीच भी विवाद। पूर्व लोकायुक्त पर भी लगे थे आरोप।
ये सारे वाक्य किसी एक व्यक्ति, समूह राजनीतिक दल के बयान नहीं हैं। एक ही दिन के अखबार के शीर्षक हैं। इन शीर्षकों पर भी एकदम कोई राय व्यक्त नहीं की जा सकती। किंतु बड़े ही दर्द और दुःख के साथ ताजा हालात पर आँसू ही बहाए जा सकते हैं, क्योंकि इन शीर्षकों में उल्लेखित व्यक्ति, पदाधिकारी और संस्था संसदीय प्रजातंत्र में सर्वोच्च आदर के पात्र हैं। संविधान की किसी भी व्याख्या में ये सदैव आदर के साथ ही चर्चा में आते हैं।
| | भारत के प्रधानमंत्री, लोकसभा के माननीय अध्यक्ष जब अचानक न्यायपालिका पर बरस पड़ते हैं या महामहिम राज्यपाल के शब्दों का चयन उनके लिए निर्धारित सीमा के बाहर दिखाई पड़ता है तो प्रथम दृष्टया एक उम्रदराज पितृपुरुष का गुस्सा प्रतीत होता है |
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आज के संदर्भ में एक ऐतिहासिक घटना याद आती है, जब विदेशी आक्रामकों ने भारतीय श्रद्धा के केंद्र सोमनाथ के मंदिर को लूटा था। इसे तहत-नहस कर दिया था। लूटपाट, चोरी, डकैती, आक्रमण में संपत्ति का नाश कोई नई बात नहीं है, न कभी रही है। लेकिन श्रद्धा का केंद्र लुटे, सर्वशक्तिमान ईश्वर लुटे, वह स्थान लुटे जहाँ भक्तिवश लोग अपना सर्वस्व अर्पण करते हैं, तो सबसे पहले आम जनता की आस्था, श्रद्धा और आत्मविश्वास टूटता है।
सोमनाथ की घटना ने भारतीय समाज में अपने समय में घोर निराशा का संचार किया था। हर हिन्दुस्तानी एक ग्लानिभाव में जीने लगा, क्योंकि उसका सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही लुट गया था। तब संतों, महात्माओं और गुरुओं ने नए सिरे से शाश्वत ज्ञान को स्थापित कर विश्वास दिलाया कि मूर्ति में भगवान थोड़े ही रहता है। वह तो घट-घट में है। अपने स्वयं के अंदर है और संसार के प्राणीमात्र में है। न जाने कितने कबीर, रैदास, तुलसीदास और घासीदास इस पूरे उपक्रम में खप गए, तब जाकर भारत पुनः जाग सका था।
इसके बाद न जाने कितनी बार भारत का आत्मविश्वास टूटा, मजबूत हुआ, हम हारे-जीते और आज की स्थिति में पहुँचे हैं। आज जिस परिस्थिति में हम हैं, इसे देखकर लग रहा है कि हमारे आदरणियों, श्रद्धा और आस्था के केंद्रों पर निरंतर हमले किए जा रहे हैं। इससे हमारा आत्मविश्वास टूट रहा है। हमारे वर्तमान मूल अस्तित्व के प्रतीक संसदीय लोकतंत्र से ही हमारा विश्वास तोड़ने की कोशिश हो रही है।
इस लेख के माध्यम से अपनी बात आगे बढ़ाते हुए मैं पूरी तरह से जानता हूँ कि मैं स्वयं भी एक पक्ष के साथ खड़ा हूँ। प्रजातंत्र के एक स्तंभ का अकिंचन हिस्सा हूँ। मैं यह भी जानता हूँ कि मेरी बात को किसी एक पक्ष की सफाई या कैफियत के बतौर लिया जा सकता है। लेकिन नहीं, एक आम आदमी के पाले में खड़ा होकर मैं कहना चाहता हूँ कि प्रजातंत्र के प्रत्येक स्तंभ को अब आत्मविश्लेषण करना ही चाहिए।
भारत के प्रधानमंत्री, लोकसभा के माननीय अध्यक्ष जब अचानक न्यायपालिका पर बरस पड़ते हैं या महामहिम राज्यपाल के शब्दों का चयन उनके लिए निर्धारित सीमा के बाहर दिखाई पड़ता है तो प्रथम दृष्टया एक उम्रदराज पितृपुरुष का गुस्सा प्रतीत होता है। हम कई लोगों की जितनी कुल आयु है, उतने वर्षों से वे सार्वजनिक जीवन में हैं।
| | यह उचित समय है, जब हमें आत्मविश्लेषण करना चाहिए। अब यदि आत्मविश्लेषण प्रारंभ नहीं हुआ तो समय चूक जाएगा। बहुत देर हो चुकी होगी |
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इसलिए अपनी उम्र, अनुभव और पद की गरिमा स्वयमेव उन्हें नकेल की रस्सी खींचने के लिए सक्षम बनाती है। लेकिन, संविधान की खिंची लक्ष्मण रेखा अपनी जगह है, वह सदैव रहेगी। इसी तरह न्यायपालिका व कार्यपालिका के कार्यों में भी सीमोल्लंघन की बात दबी जबान या ऐलानिया होती रहती है। सोमनाथ चटर्जी स्वयं एक विधिवेत्ता हैं। मनमोहनसिंह ने कानून और संविधान को मेज के चारों तरफ से देखा है। जब ये संपूर्ण सम्मान के साथ माननीय न्यायमूर्तियों को न्यायिक सीमोल्लंघन का स्मरण कराते हैं तो अपने जैसा सामान्य जन इसकी उपेक्षा नहीं कर सकता।
लक्ष्मण रेखा पार की जा रही है, यह हमें स्वीकार करना ही होगा। यह उचित समय है, जब हमें आत्मविश्लेषण करना चाहिए। अब यदि आत्मविश्लेषण प्रारंभ नहीं हुआ तो समय चूक जाएगा। बहुत देर हो चुकी होगी।
सभी की तरह प्रजातंत्र के चारों स्तंभों विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका और खबर पालिका को यही स्मरण दिलाया जा सकता है कि सभी को एक ही संविधान ने अधिकार व दायित्व सौंपे हैं। उसी संविधान की कई बार व्याख्या या पुनर्व्याख्या करते हुए संतुलन के सिद्धांतों पर प्रकाश डाला गया है और उसी संविधान के अंतर्गत हम सब लोक कल्याण की अपनी-अपनी दृष्टि विकसित कर रहे हैं। संविधान एक है, भारत एक है, उद्देश्य एक है तो फिर समझ एक जैसी क्यों नहीं हो सकती।
लोक कल्याण की समझ के अलग-अलग होने ने ही विवाद को पैदा किया है। मध्यप्रदेश में इस मत-विभिन्नता ने 'मनभेद' कर दिया है और हमारी प्रजातांत्रिक जिंदगी में जहर घुल रहा है। क्यों न हम आज से ही आत्मविश्लेषण की शुरुआत करें। (लेखक मप्र के लोक निर्माण मंत्री हैं।)
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