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साइकल क्रांति की वापसी के संकेत  Search similar articles
- विष्णुदत्त नागर

आज जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत पिछले पाँच वर्षों में पाँच गुना बढ़कर 140 अरब डॉलर के करीब हो गई है और प्रदूषित पर्यावरण की समस्या से जूझ रही है, साइकल सवारी के प्रति रुचि का प्रादुर्भाव हुआ है। फ्रांस में वेलो नामक बाइसिकल से उपजे वेलिब नामक अभियान में 60 हजार पेरिस वालों ने शामिल होकर साइकल सवारी को लोकप्रिय बनाकर दो पहिए साइकल क्रांति का आधार स्थापित किया है।

फ्रांस की राजधानी में ऐसे 800 स्टेशन कायम किए गए हैं, जहाँ से कोई भी
  ताइवान, कनाडा, रूस, यूक्रेन और योरपियन यूनियन के अन्य देशों में साठ लाख साइकल का उत्पादन ही नहीं, उपयोग भी दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। स्केनडेवियन देशों- नॉर्वे, स्वीडन, डेनमार्क, आइसलैंड और फिनलैंड में तो साइकल का उपयोग अनुकरणीय है      
नागरिक अपने काम के लिए साइकल उठा सकता है और किसी अन्य स्टेशन पर उसे जमा कर सकता है। वेलिब सदस्यों के अलावा कोई भी व्यक्ति एक साल में सिर्फ 29 यूरो के किराए पर साइकल का उपयोग कर सकता है। फ्रांस की भीड़भाड़ वाली राजधानी पेरिस में साइकलें इतनी लोकप्रिय हुई हैं कि बाजार, सरकारी कार्यालयों और उद्योगों आदि में आने वाले लोगों में आधे लोग ऐसे हैं जो साइकल का उपयोग करते हैं।


दिचलस्प बात यह है कि साइकल उपयोगकर्ताओं के लिए फ्रांस ने अलग व्याकरण रची है। महिला साइकल चालक को वेलिबिस्टेस, पुरुष को वेलिब्योर्स और गतिशील युवा अधिकारियों को वेलीबोबों की संज्ञा प्रदान की गई। उत्तरी और उत्तर-पूर्व फ्रांस में लंबी दूरियों में काम करने वालों के लिए इस प्रकार से व्यवस्था की गई है कि साइकल सवार नियत स्टेशन तक जाए और वहाँ से लंबी दूरी जाने वाली दूसरी सार्वजनिक वाहन सुविधा का उपयोग करे।

यह तो हुई अकेले फ्रांस की बात। ताइवान, कनाडा, रूस, यूक्रेन और योरपियन यूनियन के अन्य देशों में साठ लाख साइकल का उत्पादन ही नहीं, उपयोग भी दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। स्केनडेवियन देशों- नॉर्वे, स्वीडन, डेनमार्क, आइसलैंड और फिनलैंड में तो साइकल का उपयोग अनुकरणीय है। अकेला चीन विश्व के 10 करोड़ साइकल उत्पादन में से 7.50 करोड़ साइकल उत्पादन में योगदान दे रहा है। योरपीय यूनियन के देशों में पिछले पाँच वर्षों में 15 प्रतिशत साइकल की बिक्री बढ़ी है।

अमेरिका में भी प्रतिवर्ष 9 प्रतिशत साइकल उपयोग की वृद्धि हो रही है। योरप की मासिक साइकल पत्रिका के अनुसार तेल की कीमतों और प्रदूषण से चिंतित नागरिकों ने साइकल को ही अपना संकटमोचक माना है। हाल ही के वर्षों में 61अरब डॉलर का वैश्विक साइकल उद्योग केवल मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि जीवनशैली में भी परिवर्तन ला रहा है। ताइवान की राजधानी टैपे की ज्वाइंट कंपनी के आकलन के अनुसार 2007 में एक अरब डॉलर की साइकलों की बिक्री हुई।

साइकल की औद्योगिक क्रांति का आलम यह है कि ताइवान के अलावा बांग्लादेश, चीन, चेक गणतंत्र, पोलैंड, फिलीपींस, विएतनाम और योरप के समूचे बाजार के अधिकाधिक भाग पर कब्जा करने के लिए होड़ लगी हुई है। ताइवान जो योरप को 55 प्रतिशत साइकल निर्यात करता था और अमेरिका, दोनों की बिक्री योरप में घटी है। उल्लेखनीय है कि योरपीय देशों का मौसम भी साइकल की माँग को प्रभावित करता है। साइकल क्रांति के तहत ताइवान, अमेरिका और चीन में बनी बैटरी चलित साइकलों का उपयोग लोकप्रिय हो रहा है।

चीन के तीव्र आर्थिक विकास में बैटरी साइकलों का एक स्वरूप यह भी रहा है कि साइकल उपयोग से गरीब से गरीब फैक्टरी श्रमिक भी अपने काम पर जाते थकते नहीं। सन्‌ 2006 में चीन में 2 करोड़ से अधिक बैटरी चलित साइकल के उपभोक्ता थे। 36 या 48 वोल्ट की बैटरी एक घंटे में 25 किलोमीटर तक जा सकती है और इसकी कीमत 3000 चीनी युवान मुद्रा है।

जहाँ एक ओर विश्व के विभिन्न देशों में बढ़ती तेल कीमतों और प्रदूषित पर्यावरण
  साइकल उपयोग बढ़ने से ईंधन पर दी जाने वाली सबसिडी और तेल कंपनियों के सवा दो लाख करोड़ रुपए की हानि में अंततः कमी आएगी और सस्ती साइकलों का अधिकाधिक उपयोग बढ़ेगा      
के प्रति जागरूकता पैदा हुई और साइकल का उपयोग बढ़ा, वहीं दूसरी ओर भारत में साइकल क्रांति की छाया तक दिखाई नहीं देती। भारत में प्रतिवर्ष 90 लाख साइकलों का उत्पादन और 18 लाख साइकलों का निर्यात होता है, फिर भी 10 प्रतिशत साइकलें विदेशों, विशेषकर चीन से आयातित होती हैं।


पिछले तीन महीने में साइकल की कीमत 20 से 25 फीसदी बढ़ने के बाद अब प्रमुख साइकल निर्माता 40 से 50 रुपए प्रति साइकल की दर से कीमत बढ़ाने का विचार कर रहे हैं। इसका कारण यह है कि इस्पात, रसायन, टायर और ट्यूब समेत सभी कच्चे माल की कीमत में इतनी बढ़ोतरी हुई है कि इसमें लागत को समाहित करना साइकल निर्माताओं के लिए संभव नहीं है।

साइकल कारोबार में बहुत कम 3-4 फीसदी का मार्जिन होता है, लेकिन इस्पात समेत अन्य सस्ते माल महँगे हो जाने के कारण इतना मार्जिन पाना भी मुश्किल हो गया है। पिछले दो महीने में स्टैंडर्ड मॉडल की साइकलों की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण बिक्री में 10 से 20 प्रतिशत की गिरावट आई है। प्रमुख साइकल निर्माता कंपनी एटलस ने 2008-09 के दौरान अपनी कुल बिक्री में ढाई प्रतिशत की वृद्धि होने का अनुमान जाहिर किया है, जबकि 2007-08 में कंपनी की बिक्री में करीब साढ़े 7 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी।

अन्य साइकल निर्माता भी कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी की समस्या से जूझ रहे हैं। महँगे कच्चे माल की समस्या के अलावा साइकल उद्योग के प्रति केंद्र और राज्य सरकारों की उदासीनता में साइकल उद्योग को हतोत्साहित किया है। इसके अलावा ऊपर से राज्यों के बिक्री कर भी साइकलों की कीमतें बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण कारक रहा है। मध्यप्रदेश में साइकलों पर वाणिज्यिक कर 4 प्रतिशत, प्रवेश कर 1 प्रतिशत और केंद्रीय बिक्री कर 2 प्रतिशत निर्धारित किया गया है।

सवाल यह है कि दुनिया भर में ईंधन की कीमतें बढ़ने का सामना करने और पर्यावरण में प्रदूषण कम करने के लिए भारत में साइकल क्रांति कैसे हो? इसके लिए कुछ सुझाव दिए जा सकते हैं। पहला, विभिन्न प्रकार की साइकलों के उपयोग में आने वाले इस्पात, रसायन, टायर, ट्यूब आदि की कीमतों को नियंत्रित किया जाए। दूसरा, राज्यों द्वारा लगाए गए स्थानीय करों को कम या समाप्त तो किया ही जाए, साथ ही साइकल उद्योग को उत्पादन समर्थित सबसिडी भी दी जाए।

इस सबसिडी का यह लाभ होगा कि साइकल उपयोग बढ़ने से ईंधन पर दी जाने वाली सबसिडी और तेल कंपनियों के सवा दो लाख करोड़ रुपए की हानि में अंततः कमी आएगी और सस्ती साइकलों का अधिकाधिक उपयोग बढ़ेगा। तीसरा, देश के विभिन्न भागों में जहाँ फोरलेन सड़कें बन रही हैं वहाँ उसी में एक लाइन साइकल के लिए अलग से निर्धारित की जाए। साइकल उद्योगों को सबसिडी देना और फोरलेन सड़कों पर एक लेन साइकलों के लिए रखना महँगा सौदा नहीं होगा।

और चौथा, फ्रांस की तरह हर शहर के नागरिकों और आगंतुकों के लिए विभिन्न स्थानों, पार्किंग स्थलों पर पर्याप्त साइकलें उपलब्ध कराई जानी चाहिए, कम दूरी के लिए साइकलों का अधिकाधिक उपयोग बढ़ाने के लिए फ्रांस की व्यवस्था का अनुकरण किया जाना चाहिए। जहाँ कम दूरी के स्टेशन जाने के बाद अधिकाधिक दूरी के ट्रांसपोर्ट के अन्य साधनों का उपयोग किया जा रहा है। शुरू में यह प्रयोग हास्यास्पद या काल्पनिक व्यावहारिकता लग सकता है।

फ्रांस की राजधानी पेरिस में भी शुरू में लोगों ने वहाँ के वेलिब अभियान का मजाक उठाया था, परंतु वहाँ की दुपहिया क्रांति ने भारत समेत विकासशील देशों के लिए ऐसा अनुकरणीय मॉडल भी स्थापित किया जिसमें तात्कालिक और दीर्घकालिक आर्थिक और पर्यावरणीय लाभ की संभावनाएँ समाहित हैं।
(लेखक वरिष्ठ अर्थशास्त्री हैं।)
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