-बीएस भंडारी अमेरिका मेरे लिए कुछ नया नहीं है और भारतीय अमेरिकियों के अलावा मेरे रिश्ते अन्य सभी तरह के काले, गोरे और प्रवासी लोगों से हैं, मगर इस बार जो कुछ मुझे समझ में आया, वह हर बार के प्रवास से थोड़ा अलग है।
उसका खास कारण यह है कि इस बार मुझे घूमने-फिरने के अलावा अपने व्यावसायिक प्रतिष्ठान के कार्यालय में बैठकर अमेरिकी कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार की बारीकियों को जानने का मौका मिला। मेरा ध्यान उन मुद्दों पर पहले उतना नहीं गया था, भले ही मैं विदेश व्यापार और अर्थशास्त्र का अध्येता रहा हूँ।
उदाहरण के लिए वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों को बढ़ाने के उपाय कर लोगों की आमदनी, बचत और समृद्धि बढ़ाने की व्यूहरचना अपनाई जाती रही है।
| | सच तो यह है कि दुनिया में 1238 अरब बैरल का तेल भंडार है। फिलहाल वर्षभर में 896 लाख बैरल तेल का उपभोग होता है। तेल निर्यातक संगठन ओपेक के देश अपने भंडारों का दोहन अपनी आर्थिक जरूरतों के मुताबिक ही करना चाहते हैं |
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सन् 1929 की विश्वव्यापी मंदी के दुष्परिणामों से आतंकित यह देश हमेशा मानता रहा है कि मुद्रास्फीति और मुद्रा संकुचन में से चुनना हो तो मुद्रास्फीति को ही चुना जाए।
दूसरी ओर अमेरिकी जीवनशैली और सोच में प्रतियोगिता और चुनौती को सर्वाधिक महत्व दिया गया है। इसके कारण व्यक्ति स्वयं को सर्वश्रेष्ठ और सर्वाधिक संपन्न बनाने का प्रयास करता है। यह बात अलग है कि ऐसा करने में वह अधिक भौतिकवादी और उद्यमशील रह जाता है।
वह अन्य लोगों को अपने से कमजोर बनाने या पराजित करने में भी संकोच नहीं करता है। जीवन के अंतिम पड़ाव में वह स्वयं को अकेला भी महसूस करने लगता है और दूसरों पर भरोसा भी नहीं कर पाता है। जो सोच व्यक्ति का है, वही अमेरिकी राष्ट्र का भी है।
अन्य राष्ट्रों के प्रति भी अमेरिका का यही रवैया रहा है। भले ही अमेरिका के नागरिक अन्य देशों से आकर यहाँ बसे हों, मगर उन देशों पर अमेरिका कभी पूरी तरह से भरोसा नहीं कर पाया है। अमेरिका स्वयं को सर्वाधिक शक्तिशाली, समृद्ध और प्रभावशाली मानता रहा है।
यूरोप के देशों से यहाँ ज्यादा से ज्यादा लोग आए हैं, मगर यूरोप के लोगों से अमेरिकी अपने को अलग मानते हैं और यूरोप के लोग अपने को अमेरिका से अलग। यूरोपीय महासंघ इसी कारण शक्तिशाली बनने को उद्यत है।
हाल ही में यूरोपीय महासंघ के 27 राष्ट्र एकजुट हो गए हैं और उनका प्रयास है कि अमेरिका उनको दबा न सके। तेल संकट के मद्देनजर उनकी तजबीज है कि कच्चे तेल के भाव 200 डॉलर प्रति बैरल तक चले जाएँ और यूरो की विनिमय दर दो डॉलर प्रति यूरो हो जाए।
फिलहाल एक यूरो 1.53 डॉलर के बराबर है। आश्चर्य की बात यह है कि कच्चे तेल के भाव जनवरी 2007 में 50 डॉलर प्रति बैरल थे। अठारह महीनों में ऐसा तो कुछ हुआ नहीं कि तेल के दाम इतनी तेजी से इतने ज्यादा बढ़ती माँग और पूर्ति का गणित तो कहीं भी इसे ठीक नहीं ठहराता।
चीन, भारत और अन्य देशों में पेट्रोलियम पदार्थों की माँग जरूर बढ़ रही है, मगर अभी भी अकेले अमेरिका का उपयोग चीन, भारत व अन्य देशों के उपभोग से ज्यादा है। यही नहीं, अमेरिका ने मक्का व अन्य खाद्य पदार्थों से जैविक ईंधन बनाने को बढ़ावा देकर खाद्यान्नों की कीमतें बढ़ा दीं और कृत्रिम खाद्य संकट की परिस्थितियाँ खड़ी की हैं।
सच तो यह है कि दुनिया में 1238 अरब बैरल का तेल भंडार है। फिलहाल वर्षभर में 896 लाख बैरल तेल का उपभोग होता है। तेल निर्यातक संगठन ओपेक के देश अपने भंडारों का दोहन अपनी आर्थिक जरूरतों के मुताबिक ही करना चाहते हैं।
इसलिए वे तेल की कीमतों के अनुसार सौदेबाजी करते रहते हैं। वरना संसार में ऊर्जा का कोई संकट नहीं है। इस वक्त पूरा अमेरिका यह सोच रहा है कि 20 जनवरी 2009 को व्हाइट हाउस में जब नया व्यक्ति राष्ट्रपति पद की जिम्मेदारी ग्रहण करेगा तो देश की आर्थिक परिस्थितियों में क्या बदलाव आएगा।
ज्यादातर लोग रिपब्लिकन पार्टी के जॉन मेक्कैन और डेमोक्रेटिक पार्टी के बराक ओबामा से सवाल कर रहे हैं। 54 प्रतिशत लोग ओबामा के तथा 43 प्रतिशत मैक्कैन के साथ हैं।
मगर दोनों पार्टियों के राष्ट्रीय अधिवेशन, जो अगस्त व सितंबर माह में होने वाले हैं, में इन्हें अधिकृत प्रत्याशी घोषित किया जाना है और इनका समर्थन घट-बढ़ सकता है यदि वे अपने साथ उपराष्ट्रपति पद का प्रत्याशी चुनने में सतर्क नहीं रहते हैं।
ओबामा ने इसके लिए जो समिति बनाई थी, उसका अध्यक्ष त्यागपत्र दे चुका है और सारी जिम्मेदारी कैरोलिन केनेडी पर आ पड़ी है। मेक्कैन की स्थिति थोड़ी मजबूत हो सकती है यदि भारतीय मूल के लुईजियाना के रिपब्लिकन 36 वर्षीय गवर्नर बॉबी जिंदल इसके लिए तैयार हो जाएँ।
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