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मतदाता उदासीन क्यों?
मतलब देश में चुनाव के प्रति दिलचस्पी नहीं के बराबर है। इसका सबसे बड़ा कारण है- नेता चुनाव जीतने के बाद अपने क्षेत्र की सुद नहीं लेते। बड़े-बड़े वादे करने के बाद उन्हें पूरा नहीं कर पाते। जबकि मतदाता भावुक होता है। भावना के वशीभूत हो वह वक्त आने पर अच्छे-बुरे का भेद भी भूल जाता है। एक सांसद के लिए अपने विशाल क्षेत्र के प्रत्येक व्यक्ति से मिलना संभव नहीं हो पाता। पढ़े-लिखे, नौकरीपेशा, अफसर भी मत डालने में उदासीनता दिखा देते हैं। कुछ सुझाव देना चाहूँगा जिस पर यदि अमल हो तो शायद कुछ लाभ हो-

1. लोकसभा क्षेत्र को जनसंख्या के अनुसार बाँटना चाहिए। क्षेत्रफल के अनुसार नहीं। कहीं तो विशाल जनसंख्या वाला लोकसभा क्षेत्र है तो कहीं विधानसभा क्षेत्र के बराबर ही है। यही हाल विधानसभा क्षेत्रों को लेकर भी है।
2. मतदान केंद्र बस्ती में ही होना चाहिए। कहीं-कहीं बस्ती से दूर या ऐसी जगह होते हैं जहाँ आम आदमी या महिला को जाने में हिचकिचाहट होती है। अत: मतदान केंद्र सबकी पहुँच में हो यह अतिआवश्यक है।
3. हो सके तो गाँव या शहर में सख्त पहरे के बीच चलित मतदान केंद्र की व्यवस्था हो, जो घर-घर जाकर मत डलवा सके।
4. मतदान केंद्र पर मतदाता के लिए बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध होना जरूरी है।
5. देश में विगत में कहीं-कहीं मतदान केंद्रों पर ‍अप्रिय घटनाएँ हो चुकी हैं। इस स्थिति में मतदाता वहाँ जाने से कतराता है। इसके लिए उपाय जरूरी हैं।
6. मतदाता को जागरूक करना और अच्छे-बुरे का भान कराना बेहद जरूरी है।
7. मतदाता के लिए मत डालना आवश्यक कर देना चाहिए।
8. जहाँ खतरे की आशंका रहती है, ऐसा मतदान केंद्र बदल दिया जाना चाहिए।
9. अपराधी तत्वों और असाम‍ाजिक व्यक्ति को चुनाव लड़ने से रोका जाना चाहिए।
10. एक ही व्यक्ति को बार-बार चुनाव लड़ने से रोका जाना चाहिए। ताकि दूसरों को भी मौका मिल सके। दो बार से ‍अधिक विजयी उम्मीदवार को केवल प्रमुख सलाहकार बनाया जाना चाहिए।
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