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दुनिया के मजदूरों! एक हो जाओ
मजदूर दिवस पर‍ विशेष
- विष्णुदत्त नागर

आज 'मजदूर दिवस' है- उन मजदूरों का, जिनसे उनका श्रम ही नहीं छीना जा रहा है, बल्कि भविष्य भी अंधकारमय बनाया जा रहा है। मजदूर दिवस का उन मजदूरों के लिए क्या अर्थ जहाँ बाजारवाद ने आय और उत्पादन के अर्थ ही नहीं बदले, बल्कि पूँजी और प्रगति के रास्ते भी बदल दिए। बाजारवाद ने विकास का पैमाना बदल दिया है और विनिवेश तथा पूँजीकरण की आड़ में उपयोगी श्रम को बेकार कर दिया है।

मजदूर दिवस उन मजदूरों को क्या आश्वासन देगा, जहाँ उत्पादन क्षेत्र में लूट-खसोट के लिए उपक्रमों को निजी हाथों में सौंपने या बाजार के हवाले किया जा रहा है। गाँधीजी के शब्दों में 'उद्योग का महत्व इस बात से कतई नहीं आँका जाना चाहिए कि उससे दूर बैठे निष्क्रिय पूँजी भागीदारों को लाभांश कितना मिलता है, बल्कि इसके आँका जाना चाहिए कि इसमें लगे कामगारों के शरीर, प्राण एवं आत्मा पर उद्योग का क्या प्रभाव पड़ता है।'

गाँधीजी जीवनोपयोगी वस्तुओं के उत्पादन के साधन जनसाधारण की नियंत्रण परिधि में सौंपने के पक्ष में थे, लेकिन उनके सामान्य और सीधे सुझावों की उपेक्षा का परिणाम यह है कि मजदूर इस देश में ही नहीं, दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी बेरोजगारी, गरीबी और अभाव में दिखते हैं। सचाई यह है कि साधनों पर विदेशी इजारेदारी कायम होने की ओर बढ़ते कदम मजदूरों और किसानों पर असर डाल रहे हैं।

दुर्भाग्य से राजनीतिक दलों और श्रम संगठनों ने भी वैश्वीकरण और उदारीकरण के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया है। वैश्वीकरण व उदारीकरण आम लोगों को सुख-सुविधा देने के थोथे अवसरों के बदले उनसे उनकी रोजी-रोटी के बचे-खुचे अवसर छीन रहा है। सरकारी उपक्रमों को बेचकर या बंद कर श्रमिकों को चाहे तात्कालिक क्षतिपूर्ति कर दी जाए, लेकिन किसी कौशल के अभाव में वे भूखो मरने के लिए अभिशप्त हैं। हमारी आर्थिक नीति के कारण भविष्य में देश के नौजवानों को रोजगार के लाले पड़ जाएँगे। श्रम कानूनों में संशोधन के नाम पर सरकार औद्योगिक संस्थाओं में ले-ऑफ, छँटनी के माध्यम से संस्थाओं को बंद कर रही है।

मजदूर अमेरिका का हो या चीन का, योरप का हो अथवा जापान का, भारत का हो या पाकिस्तान का, सभी वित्तीय पूँजी के शोषण के शिकार हैं। इन देशों में मजदूर छोटे-छोटे अस्मिता समूहों में बँटे हैं, जो संकीर्ण स्वार्थ से बँधे हुए हैं। संख्या के लिहाज में ये अलग-अलग अस्मिता समूह अपनी वित्तीय आवश्यकताओं के लिए निजी संसाधनों और सार्वजनिक एजेंसियों पर निर्भर हैं, जो इन्हें रणनीति बनाने से रोकती हैं। पहले, सभी अर्थव्यवस्थाओं में उत्पादन हमेशा किसी न किसी जरूरत को पूरा करने के लिए होता था, परंतु अब पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में उत्पादन और विपणन का एकमात्र उद्देश्य अधिक से अधिक लाभ और पूँजी पैदा करना हो गया है।

पिछले दो दशकों में विकसित व्यावसायिक अर्थव्यवस्थाओं में वैश्विक श्रम शक्ति चार गुना बढ़ी है, लेकिन यह शक्ति बाजार में अपेक्षाकृत कम पूँजी के साथ आई। नतीजा यह हुआ कि पूँजी-श्रम का अनुपात घटता गया और तुलनात्मक आधार पर श्रम अधिक होने और पूँजी कम होने से पूँजी की प्राप्तियाँ बढ़ती गईं। मंदी के गंभीर दौर से गुजर रही अमेरिकी अर्थव्यवस्था में अकेले फरवरी 2008 में 65 हजार लोगों की नौकरियाँ जा चुकी हैं। इससे पूर्व जनवरी में 22 हजार लोगों को रोजगार गँवाना पड़ा। एक अनुमान के अनुसार मार्च में बेरोजगारों की संख्या में 25 से 30 हजार की संख्या और जुड़ी। न्यूयॉर्क के अर्थशास्त्री इयान शेफरडेन के अनुसार स्थिति इतनी भीषण हो गई है कि मजदूरों को इससे भी खराब स्थिति देखना पड़ सकती है।

चीन 1979 में पारित 'एक संतान की नीति' के कारण, आज 18 से 35 वर्ष के वर्ग की श्रम शक्ति कमी की संकट से जूझ रहा है। चीन की 1.3 बिलियन (130 करोड़) की आबादी में अभी भी आधे खेती पर निर्भर हैं, चीन का औद्योगिक जगत उन्हें अपनी ओर आकर्षित करने के लिए प्रयासरत है। आज भी चीन के ग्रामीण क्षेत्र के 13 करोड़ से अधिक खाना बनाने वाले वेटर, क्लीनर, बिल्डर और अन्य प्रकार के अकुशल श्रमिकों को खेती से अन्य क्षेत्रों की ओर मोड़ा जा रहा है।

इस प्रकार के प्रवासी श्रम शक्ति से जहाँ एक ओर चीन के ग्रामीण क्षेत्र की आय में 50 प्रतिशत प्रवासी आय बढ़ी है, वहीं दूसरी ओर गाँव वीरान हो गए हैं और परिवार बिखर गए हैं। जापान भी इसी प्रकार की श्रम कमी से ग्रसित है, जहाँ वृद्धों की बढ़ती संख्या ने उद्योगों के समक्ष नए प्रकार का श्रम संकट उपस्थित कर दिया है। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका में भी प्रयासों के अनुरूप रोजगार का सृजन नहीं हो रहा है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने इस विशेष चिंता जाहिर करते हुए कहा है कि यदि आर्थिक समृद्धि की रफ्तार के साथ-साथ रोजगार नहीं बढ़ते तो स्थिति विस्फोटक हो जाएगी। भारत में संगठित क्षेत्र के 36 करोड़ श्रमिकों की स्थिति और भी अधिक दयनीय है।

भूमिहीन परिवार प्रायः गाँवों के कुछ संपन्न परिवारों के कर्ज से ग्रसित होते हैं, जिसके भुगतान के लिए उन्हें स्वयं या अपने परिवार के किसी सदस्य को बेहद कम मजदूरी पर कार्य करने की मजबूरी होती है। प्रवासी मजदूरों में भी भूमिहीन मजदूरों की संख्या अधिक होती है। अनेक बार वे अपने परिवार के लिए अग्रिम राशि ठेकेदारों से लेते हैं और इसके बाद कई महीनों तक उनके पास बंधक स्थिति में काम करते हैं। भूमिहीन मजदूरों की दशा सुधारने और भूमि सुधारों की बातें तो अनेक बार की गईं, लेकिन भूमि सुधार, भूमि वितरण के कार्यक्रम के क्रियान्वयन को किसी भी राज्य ने गंभीरता से नहीं लिया।

दुर्भाग्य से दुनिया के श्रमिकों को दो भागों में बाँटने और उनके बीच खाई पैदा करने के अनेक प्रयास किए गए। पहला प्रयास 1996 में सिंगापुर में हुआ था। वहाँ पूँजी निवेश के मुद्दे को नए रूप से उठाया गया था। पूँजी निवेश का अर्थ था कि विकासशील देशों में बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अपने उत्पादों को बेचें और घरेलू उत्पादों को बाजार से निकाल दें। श्रम विभाजन का दूसरा प्रयास 1998 में जिनेवा में हुआ, जहाँ श्रमिकों के हितों के खिलाफ निर्णय लिए गए।

इतिहास साक्षी है कि विदेशी पूँजी निवेश ने पिछले पाँच वर्षों में मैक्सिको, पूर्वी एशिया, रूस और ब्राजील की अर्थव्यवस्था को ध्वस्त किया और हजारों श्रमिकों को बेरोजगारी का सामना करने के लिए मजबूर किया। अतः आवश्यकता इस बात की है कि छोटे-छोटे अस्मिता समूहों में बँटे और संकीर्ण सुविधाओं से बँधे विकसित और विकासशील देशों के श्रमिकों का कोई सक्षम अंतरराष्ट्रीय सामाजिक, आर्थिक आंदोलन हो, जो विश्व जनमानस पर वित्तीय पूँजी के उत्पाद के प्रति ध्यान आकर्षित कर सके।
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