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जीने का पहला हक भारतीयों का
पूर्व में औद्योगिक और व्यापारिक संगठनों ने समय-समय पर चेतावनी भी दी है कि यदि समय पर निर्यात नहीं रोका गया तो दालों की कीमतें 35 से 45 रु. के दायरे से बढ़कर 45 से 55 रु. तक पहुँच जाएगी। अन्य वस्तुओं की कमी के बारे में भी सरकार को मालूम था, क्योंकि यूपीए सरकार के पास विभिन्न वस्तुओं के उपभोग के आँकड़े उपलब्ध हैं।

वियतनाम और मिस्र जैसे देशों में जैसे ही फसल खराब हुई और चावल के मूल्य बढ़ने के आसार दिखाई देने लगे, वहाँ निर्यात बंद कर दिए गए, लेकिन हमारी सरकार सोती रही। आग लगने पर कुआँ खोदने की नीति के तहत जब विभिन्न मंत्रालयों के बीच वार्ताएँ हुईं, नीति बनी और उनकी घोषणा हुई तब तक बाजार में आग फैल चुकी थी। देश की 100 से अधिक वस्तुओं से जुड़ा कमोडिटी एक्सचेंज कार्यरत है जो भविष्य में होने वाली माँग और पूर्ति के आधार पर भविष्य के वायदे बाजार को संचालित करता है।

क्या यह नहीं हो सकता कि केंद्रीय सरकार और राज्य सरकारें आम बजट की तरह उपभोग वस्तु बजट बनाएँ और देश के 600 से अधिक जिलों की विभिन्न आवश्यक वस्तुओं की माँग के आधार तथा उत्पादन के फसल चक्र को देखते हुए आपूर्ति करे। सार्वजनिक वितरण प्रणाली जरूरी है, लेकिन उससे अधिक जरूरी है सरकारी वस्तु बजट, जिसके निर्धारित और संचालित करने के प्रति संवैधानिक बाध्यता हो। इसके लिए संविधान में संशोधन किया जा सकता है।

देश की आम जनता महँगाई की आग में अधिक दिनों तक नहीं जल सकती है और न ही बाजार अस्थिरता को सह सकता है। इसका अर्थ यह भी नहीं है कि रुपए की विनियम दर में तेजी और अंतरराष्ट्रीय बाजार के संकेतों से प्रभावित गैर आवश्यक वस्तुओं के निर्यातकों को रियायतें और सौगातें न दी जाएँ।

इस संबंध में वाणिज्य मंत्री द्वारा खेलकूद के सामान, दूरसंचार, हार्डवेयर, उच्च प्रौद्योगिकी तथा ज्ञान आधारित सेवाओं के निर्यात हेतु विशेष पैकेजों की घोषणा स्वागतयोग्य है। लेकिन वित्तमंत्री को नए वर्ष 2008-09 में विदेश व्यापार नीति में छोटे निर्यातकों का भी ध्यान रखना चाहिए था। आज स्थिति यह है कि चीन तथा अन्य देशों को बड़े पैमाने पर सस्ता आयात हो रहा है लेकिन उसे रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाए गए हैं।

उल्लेखनीय है कि आर्थिक भूमंडलीकरण के दौर में जिस आयात-निर्यात की संस्कृति की लोरियाँ गाई जा रही हैं, उसका पलना बाजार है। इतिहास साक्षी है कि मुक्त व्यापार की माँग जो विकसित राष्ट्र कर रहे हैं उनमें योरप, अमेरिका और जापान ने संरक्षणवाद की गोद में ही अपना विकास किया। अब जबकि इन्होंने विराट रूप धारण कर लिया तब वे वामन रूप के विकासशील राष्ट्रों से कह रहे हैं कि वे आयात और निर्यात पर कोई रोक न लगाएँ।

इतिहास इस बात का भी गवाह है कि जिस देश ने घरेलू माँग को ध्यान में रखते हुए मूल्य स्थिरता की नीति अपनाई वह देश ही तेजी से आगे बढ़ा है और इसके विपरीत विदेशी व्यापार पर आधारित राष्ट्रों ने विनिमय दर स्थिरता को सुनिश्चित किया है, उनका अस्तित्व ही इतिहास पर अंकित है। अतः भारत को अपनी सोच घरेलू माँग और मूल्य स्थिरता पर ही केंद्रित करना होगी।

रुपए का बाह्य मूल्य तो बढ़ता रहे और उसकी आंतरिक क्रयशक्ति घटती रहे, यह स्थिति अधिक दिनों तक नहीं चल सकती। अतः हमें यह बुनियादी बात ही स्वीकार करनी होगी कि हम ऐसी अर्थव्यवस्था के बारे में सोचें, जो विश्व के खाद्यान्नों की बढ़ती माँग और कीमतों की वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए जो भारतीयों की, भारतीयों के द्वारा और भारतीयों के लिए हो।
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