हरफीक विसाल उनके अपने मुल्क ने उन्हें हाशिए पर ठेल दिया है। हमसाया मुल्क में न कोई लीडर उनका नाम लेता है और न ही मीडिया में कोई सुगबुगाहट सुनाई देती है। लकवाग्रस्त हुए सात साल से ज्यादा का अरसा बीत गया, वे अभी भी बिस्तर पर ही हैं।
लता मंगेशकर ने कभी कहा था कि मेहँदी हसन के गले से निकलने वाली आवाज साधारण नहीं है, उनकी आवाज में भगवान बोलता है। पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी को खाँ साहब की आवाज बहुत पसंद है। 2004 में उन्होंने हाल-एहवाल पूछते हुए खत लिखा था कि आप भारत आएँ तो हमें खुशी होगी।
इसी तरह गजल गायक जगजीतसिंह उनसे मिलने के लिए पाकिस्तान पहुँचे थे। यही नहीं, उन्होंने खाँ साहब की आर्थिक मदद भी की थी। भारत में आज भी उनके चाहने वालों की कमी नहीं है। लेकिन उनके अपने मुल्क ने उन्हें हाशिए पर ठेल दिया है। हमसाया मुल्क में न कोई लीडर उनका नाम लेता है और न ही मीडिया में कोई सुगबुगाहट सुनाई देती है।
लकवाग्रस्त हुए सात साल से ज्यादा का अरसा बीत गया, वे अभी भी बिस्तर पर ही हैं। खाँ साहब का बायाँ हिस्सा लकवे से प्रभावित हुआ है, लेकिन भारत-पाकिस्तान की फिजाओं में अभी भी उनकी आवाज गूँज रही है। सुगम संगीत की जीवित किंवदंती बन चुके खाँ साहब ने अपने फन में जो मुकाम पाया है, वह जिंदगी में बहुत कम फनकारों को नसीब होता है।
होश संभालने के बाद जब गाना शुरू किया तो वह दौर उस्ताद बरकत अली खान, बेगम अख्तर और मुख्तार बेगम का दौर था। इनकी आवाज के लोग दीवाने थे। नए गायकों को श्रोता सुनना ही पसंद नहीं करते थे। ऐसे में मेहँदी हसन ने जो पहचान हासिल की, उसके वे हकदार थे। उनकी आवाज का सफर बहुत लंबा है।
इस आधी सदी को सदियाँ सलाम करेंगी। खाँ साहब ने गायन की बाकायदा तालीम पिता उस्ताद अजीम खान साहब और चाचा इस्माईल खान से ली। दोनों अपने जमाने के मशहूर ध्रुपद गायक थे। उनके खानदान में गायन की परंपरा पंद्रह पीढ़ियों से जारी है।
मेहँदी हसन सोलहवीं पीढ़ी से हैं। उनके दो भाई उस्ताद नियाज हुसैन शामी और पंडित गुलाम कादिर भी गायक हैं। खाँ साहब की सत्रहवीं पीढ़ी में उनके बेटे आसिफ और कामरान भी प्रस्तुतियाँ देते हैं। लेकिन जो शोहरत मेहँदी हसन को मिली है, उससे खानदान के दूसरे सदस्य वंचित रहे। राजस्थान के छोटे-से कस्बे में मेहँदी हसन का जन्म (1927) हुआ। यहाँ से वे पिता के साथ जाते थे।
एक दिन पिता बड़ौदा महाराज के दरबार में प्रस्तुति दे रहे थे कि तभी महाराज की निगाह मासूम मेहँदी पर पड़ी। महाराज ने कहा, क्या इस बच्चे ने तालीम ली है। इस तरह यहाँ आठ साल की उम्र में पहली प्रस्तुति दी। हालाँकि दरबारों में गायन की परंपरा उनके परिवार में बहुत पुरानी रही है। उनके पुरखे इंदौर के होलकर महाराज, पटना, छतरपुर और मैसूर महाराज के दरबारों में गाते रहे हैं। यही वजह थी कि खाँ साहब को छोटी उम्र में बड़ा मौका मिला।
मेहँदी हसन जब सिर्फ बीस बरस के थे तब भारत का एक हिस्सा मजहब के नाम पर अलग हो गया। पूरा कुनबा हिजरत (पलायन) कर उस हिस्से (पाकिस्तान) में चला गया। यहाँ छोटी-मोटी महफिलों में मौके मिलते रहे, लेकिन 1952 में रेडियो कराची में गाने की नौकरी मिल गई।
हालाँकि इससे पहले विभाजन के बाद एक साइकल की दुकान पर कुछ समय नौकरी करना पड़ी और फिर आप बाकायदा मोटर मैकेनिक बन गए। 1956 में 'कुँवारी बेवा' (कुँवारी विधवा) नाम से फिल्म बनाई। इसी साल फिल्म 'शिकार' में पहली बार गाने का अवसर भी मिल गया। गाने के बोल थे... नजर मिलते ही दिल की बात का लबों पर चर्चा न हो जाए
इसके बाद 1962 में 'ससुराल' नाम से फिल्म बनाई। इसमें भी आपने एक गाना गाया था (जिसने मेरे दिल को दर्द दिया/ उस शक्ल को मैंने भुलाया नहीं)। लेकिन 1964 में फिल्म 'फिरंगी' में राग जैजैवंती में फैज अहमद 'फैज' की गजल गाई तो खूब शोहरत मिली- गुलों में रंग भरे बादे नौबहार चले चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले
तकरीबन दो दशक तक खाँ साहब बाकायदा तौर पर पाकिस्तान फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े रहे और 1956 से 2000 तक 631 फिल्मों के लिए तकरीबन 25 हजार गाने गाए। इनमें से 445 फिल्में रिलीज भी हुईं। इनमें उर्दू, पंजाबी, सिंधी और बांग्ला भाषा के गाने शामिल हैं, लेकिन फिल्मों से उन्हें सिर्फ दौलत मिली, शोहरत और मकबूलियत तो गजल गायिकी ने ही दिलाई।
उन्हें बेगम अख्तर के बाद सबसे ज्यादा जनप्रिय गजल गायक माना जाता है। उन्हीं से मुतास्सिर होकर भारत में जगजीतसिंह, पंकज उधास, अनूप जलोटा, तलत अजीज और भूपिंदर गजल गायकी की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
मेहँदी हसन की आवाज से निकली यूँ तो हर गजल मकबूले-आम है, लेकिन कुछ गजलें बहुत पसंद की जाती हैं। बहादुरशाह जफर की गजल (बात करनी मुझे मुश्किल तो न थी...) जिसे राग पहाड़ी में गाया है। इसी तरह राग किरवानी में गाई अहमद फराज की गजल (शोला था जल बुझा हूँ...), कतील शिफाई की गजल (जिंदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं...) जिसकी धुन नौशाद ने तैयार की थी, को काफी पसंद किया जाता है।
इसी के साथ अहमद 'फराज' की मशहूर गजल 'रंजिश ही सही दिल को दुखाने के लिए आ...' मेहँदी हसन को सबसे ज्यादा पसंद है। इस गजल को 1971 में संगीतकार निसार बज्मी ने तैयार किया था, लेकिन बाद में खाँ साहब ने खुद इसे कंपोज किया। यही नहीं, अहमद फराज साहब ने तो सिर्फ पाँच शेर ही कहे थे, लेकिन शायर तालिब बागपती से आपने चार शेर और जुड़वाए थे, जो 'फराज' के नाम से ही मंसूब हैं।
भारत से मेहँदी हसन का बहुत गहरा रिश्ता रहा है। उनके पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी से गहरे ताल्लुकात रहे हैं। अटलजी उनकी गजलों को काफी पसंद करते हैं। यहाँ तक कि 2004 में जब इलाज के लिए आए तो अटलजी ने काफी मदद की थी। उस वक्त मेहँदी हसन और उनके बड़े बेटे आरिफ मेहँदी और आसिफ ने लाहौर में कहा था कि अगर पाकिस्तान सरकार इलाज के लिए मदद नहीं करेगी तो हमें भारत की नागरिकता लेने में भी कोई हिचक नहीं होगी।
मेहँदी हसन उस वक्त 2004 में तीन माह इलाज के लिए दिल्ली में रहे थे। तब वे यह सोचकर आए थे कि गर वे पूरी तौर पर ठीक हो गए तो मुंबई-दिल्ली में जरूर प्रस्तुति देंगे। लेकिन इलाज में खास फायदा नहीं हुआ और उन्हें अपने वतन लौटना पड़ा। तकरीबन आठ साल से खाँ साहब बिस्तर की सिलवटों में कैद हैं।
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