ओशो ने गत चार दशक पूर्व साधना मंदिर के लिए सर्वप्रथम इंदौर में जीवन जागृति केन्द्र की स्थापना की थी। जीवन दुख नहीं है, वासना दुख है क्योंकि दुख तो फल है और वासना बीज है। जीवन की सारी अनुभूतियाँ विपरीत पर निर्भर है।
इस जगत में सभी चीजों का उपयोग किया जा सकता है और ऐसे उपयोग की समझ का नाम ही साधना है। साधना का अर्थ है बुराई में से भी सत्य की तरफ उठो। मैं जो बातें कह रहा हूँ वे साधना के नाम पर, मोक्ष के नाम पर, धर्म के नाम पर जो भी चलता रहा है, वह सब व्यर्थ है। साधना के लिए नैतिक चेतना में एक आंदोलन उपस्थित किया जा सके चेतना तैयार है आंदोलन के लिए
तो मित्रों का एक समूह जीवन जाग्रति केन्द्र बन सके। ध्यान केन्द्र से या ध्यान मंदिर से मेरा प्रयोजन है वैज्ञानिक विधियों से, वैज्ञानिक व्यवस्था से आधुनिक आदमी के मन को ध्यान से न केवल बौद्धिक रूप से परिचित कराया जा सके, बल्कि प्रायोगात्मक, एक्सपेरिमेंटली भी उसे प्रवेश दिया जा सके। एक वैज्ञानिक व्यवस्था, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति आज की आधुनिकतम व्याख्या, भाषा, प्रतीकों में समझ सके। न केवल समझ सके, बल्कि कर भी सके और ध्यान से परिचित भी हो।
ध्यान का साकार या निराकार से कोई भी संबंध नहीं है। ध्यान का विषय-वस्तु से ही कोई संबंध नहीं है। ध्यान है विषय वस्तु रहितता। गाढ़ निद्रा की भाँति, लेकिन निद्रा में चेतना नहीं है और ध्यान में चेतना पूर्णरूपेण है। अर्थात निद्रा अचेतन ध्यान है। या ध्यान सचेतन निद्रा है। गाढ़ निद्रा में भी हम वही होते हैं, जहाँ ध्यान में होते हैं, लेकिन मूर्च्छित। ध्यान में भी हम वहीं होते हैं, जहाँ निद्रा में होते हैं, लेकिन जाग्रत। जागते हुए सोना ध्यान है। या सोते हुए जागना ध्यान है।
फिर जो जाना जाता है, वह न आकार है, न निराकार है। वह है आकार में निराकार, या निराकार में आकार। असल में वहाँ द्वंद्व नहीं है। द्वैत नहीं है और इसलिए हमारे सब शब्द व्यर्थ हो जाते हैं। वहाँ न ज्ञाता है, न ज्ञेय है, न दृश्य है, न दृष्टा है। इसलिए वहाँ जो है, उसे कहना असंभव है। कठिन नहीं, असंभव है।
ध्यान है मन की मृत्यु और भाषा है मन की अर्द्धांगिनी, वह मन के साथ ही सती हो जाती है। वह विधवा होकर जीना नहीं जानती है, जाने तो भी जी नहीं सकती है। और उसका पुनर्विवाह भी नहीं हो सकता है, क्योंकि मन के पार जो है, वह उससे विवाह के लिए चिर-अनुत्सुक है। उसका विवाह हो ही चुका है शून्यता से।
संसार में हम बोते हैं पहले, काटते हैं बाद में। अध्यात्म में हम काटते हैं पहले, बोते हैं बाद में। संसार और अध्यात्म का संबंध बिलकुल उल्टा है, जो यहाँ नियम है, ठीक उससे विपरीत वहाँ नियम है। संसार के सारे नियम अगर हम विपरीत कर लें, तो वे अध्यात्म के नियम हो जाते हैं। अगर शांति का अनुभव चाहिए तो अशांति से गुजरना वैज्ञानिक रूप से जरूरी है, नहीं तो शांति की कोई प्रतीति न होगी।
आप शांत भी हो सकते हैं, तो भी आपको शांति की प्रतीति तभी होगी, जब आप अशांति से गुजर जाएँ। अगर आपने जीवन में अशांति नहीं जानी, तो आप शांति को कैसे जानिएगा। कोई उपाय जानने का नहीं है। अशांति की पृष्ठभूमि चाहिए तो शांति उभरती है। ध्यान को मैं आँख कहता हूँ आपके जीवन की। ध्यान की समस्त प्रक्रियाएँ, क्षण भर को ही सही, तुमसे इस आवरण को छुड़ा लेने के उपाय हैं।
एक बार तुम्हें झलक आ जाए, फिर ध्यान की कोई जरूरत नहीं। फिर तो वह झलक ही तुम्हें खींचने लगेगी। फिर तो वह झलक ही चुंबन बन जाएगी। फिर तो वह झलक तुम्हें पुकारने लगेगी और ले चलेगी उस राह पर, जहाँ यह सूत्र पूरा हो सकता है, 'तुम्हें शांति प्राप्त हो'
जीवन जाग्रति केन्द्र का नाम 1975 में बदलकर 'समवेत रजनीश संन्यास आश्रम' कर दिया। 14 वर्ष तक बड़ा रावला में आश्रम के चलते रहने के बाद 1989 में नाम बदलकर 'ओशो समवेत ध्यान केन्द्र' कर दिया गया, जो स्थायी रूप से उषा नगर में संचालित है। -प्रस्तुति : आनंद गौतम
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