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क्या होती है संबोधि?
ओशो संबोधि दिवस पर विशेष
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700 साल पूर्व ओशो एक विशेष साधना में रत थे उनके मित्र के ही साथ। साधना के मात्र 3 दिन बाकी थे और मित्र ने उनकी हत्या कर दी। यदि वह तीन दिन पूरे हो जाते तो उन्हें दोबारा जन्म लेने की आवश्यकता नहीं होती। बच गए तीन दिन इस जन्म में सात-सात वर्ष करके तीन भागों में विभक्त हुए। ओशो ने जब जन्म लिया था, तब तीन दिन तो कुछ भी खाया और पीया नहीं था।

7 वर्ष की आयु में मृत्यु का पहला अनुभव फिर 14 वर्ष की आयु में, बाद इसके 21 वर्ष की उम्र में 21 मार्च 1953 को जबलपुर के भँवरताल बगीचे में मौलश्री वृक्ष के नीचे रात को लगभग आठ बजे उन्हें संबोधि घटित हुई। इसे नि:शब्द समाधि में होना भी कहते है। वे सुबह तक वहीं मौन में बैठे रहे।

ओशो का कहना है कि उस दिन के बाद से ही मैं शरीर में नहीं हूँ। हूँ पर उस तरह नहीं जिस तरह कि कोई होता है। शरीर से अब तादात्म्य नहीं रहा।

क्या होती है संबोधि : यह धर्म के मार्ग पर रखा गया पहला कदम है। इसे योग में सम्प्रज्ञात समाधि का प्रथम स्तर कहा गया है, जब निर्विचार दशा परिपक्व होती है तब संबोधि घटित होती है। इस दशा में व्यक्ति का ‍चित्त स्थिर रहता है। शरीर से उसका संबंध टूट जाता है। फिर भी वह इच्छानुसार शरीर में ही रहता है। यह कैवल्य, मोक्ष या निर्वाण से पूर्व की अवस्‍था मानी गई है।

कैसे घटित होती है संबोधि : जब हम सप्रयास लगातार साँसों के आवागमन और अंतराल पर ही ध्यान देते हुए ध्यान करते है तब एक दिन ऐसा आता है कि मन और मस्तिष्क में विचारों और भावों की अनवरत चल रही श्रृंखला टूट जाती है। ऐसी अवस्था में व्यक्ति जागते हुए भी सुसुप्ति का आनंद लेता है। इस घटना से सूक्ष्म शरीर पर जबरदस्त प्रभाव पड़ता है। वह ज्यादा सक्रिय होकर स्थूल शरीर से बाहर निकलने की ताकत में होता है। ऐसे व्यक्ति को ही संबुद्ध या सिद्ध पुरुष कहते है।

संबोधि के खतरे : पहली बात तो यह कि संबोधि के प्रयास में व्यक्ति की मृत्यु के मौके ज्यादा होते हैं। पहला कदम ही झटके देने वाला होता है। यदि सम्भालने वाला गुरु न हो तो मृत्यु संभंव भी है, और नहीं भी। अर्थात, व्यक्ति आनंद में उत्सुक हो शरीर छोड़कर चला जाता है। इसे ऐसे कहें कि जिसे बंगला मिल गया हो वह क्यों झोपड़ी में रहे।

दूसरी बात यह कि यदि ठीक तरह से उस दशा को अवेयरनेस रखते हुए मेंटेन नहीं रखा तो पागलों जैसा व्यवहार होने के खतरे हैं। सूफी फकीर इस दशा से जब गुजरते हैं तो दीवाने होकर नाचने लगते है, जिबरीश (ऐसे शब्दों का प्रयोग जिनका कुछ अर्थ नहीं होता और जो किसी भाषा के नहीं रहते) का प्रयोग करते हैं या अचानक बहुत समय के लिए मौन हो जाते हैं।

तीसरी बात की छोटी-मोटी ऊँचाई से गिरने पर संभवत: चोट कम लगे, लेकिन बड़ी ऊँचाई से गिरने पर बचने के मौके नहीं होते। या तो गंभीर चोट या फिर मुत्यु होना तय है। इस तरह जब कोई उस मार्ग पर चलता है तो अधिकतर मौकों पर संसार की उलझनें उसे वापस विचारों और भावों के झंझावात में खींच लाती हैं, इसलिए ओशो ने सांसारिक संन्यास का निर्माण किया और समूह ध्यान की सलाह दी है ताकि तुम गिरो तो मैं संभालूँ और मैं गिरता हूँ तो तुम।

अंतत: जो चाहते हैं कि इसी जन्म में हम भी पा लें तो अकेले-अकेले ध्यान करते हुए जब लगे कि अब कुछ घटित हो सकता है तो समूह ध्यान को अपनाएँ और उस निरंतरता को टूटने न दें। सतत लगे रहें, मंजिल सामने ही दिखने लगेगी।
-प्रस्तुति : अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'

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