प्रिय पाठको, इन दिनों इंटरनेट पर ब्लॉग अभिव्यक्ति का सर्वश्रेष्ठ माध्यम बन गया है। 'माय वेबदुनिया' (वेबदुनिया ब्लॉग) को भी इसकी शुरुआत से ही बहुत अच्छा प्रतिसाद मिल रहा है। वेबदुनिया के सुधी और जिज्ञासु पाठक विभिन्न मुद्दों पर अपने सटीक विचार लोगों के समक्ष रख रहे हैं। इन विचारों को और धारदार बनाने के लिए हम कुछ रचनाओं को छाँटकर नियमित रूप से उनकी समीक्षा पेश करेंगे। उम्मीद है हमारा यह प्रयास आपको पसंद आएगा। -संपादक इनका साहित्यिक मूल्य भी है... 'बॉलीवुड म्यूजिक' के तहत गुलजार का गीत ‘आपकी आँखों में कुछ महके हुए से राज हैं...’ और इन्दीवर का गीत ‘जिसकी रचना इतनी सुन्दर वो कितना सुन्दर होगा...’ पढ़ने को मिले। एक बार फिर इन दोनों गीतकारों की मार्मिक काव्य संवेदनाओं ने दिल को छू लिया। यह हमारे बुद्धिजीवियों का दोमुँहापन है कि एक तरफ तो वे फिल्मी गीतों पर नाक-भौं सिकोड़ते हैं तो दूसरी तरफ औसत दर्जे की कविताओं पर वाह-वाह करते हुए कई पन्ने काले करते रहते हैं।
हिन्दी फिल्मी गीतों की समृद्ध परम्परा रही है। इसने आज तक लोगों को अपने मोहपाश में बाँधे रखा है। इस पर शोध हो सकता है कि फिल्मी गीतों ने लोगों को जिन्दगी के किन मोड़ों पर, कहाँ और कैसे राहत दी होगी, उन्हें प्रेम, दु:ख में टूटन और पीड़ी में किस तरह थाम लिया होगा।
इस पर गौर किया जाना चाहिए कि शैलेन्द्र से लेकर साहिर, राजा मेहँदी अली खाँ से लेकर मजरूह सुल्तानपुरी ने उम्दा शायरी से न केवल गीतों की दुनिया को महकाया है बल्कि अपने साहित्यिक कद का भी अहसास कराया है। और यह सब फिल्मी दुनिया में रहते कर दिखाया, बगैर किसी आलोचक की कृपा के।
जाँ निसार अख्तर से लेकर कैफी आजमी तक ने अपनी जादूगर कलमकारी से फिल्मी गीत-गजल को ऊँचा पाया दिया और ये गीत-गजल अपनी नशीली-मदहोश कर देने वाली धुनों की वजहों से ही लोगों की जिन्दगी में नहीं धड़क रहे हैं बल्कि अपने साहित्यिक मूल्यों के कारण भी। इसलिए ये गीत सुनने के साथ-साथ पढ़ने पर भी उतना ही प्रभावित करते हैं। कुछ गीत और कुछ गीतों की पंक्तियाँ दिल को गहरे छू जाती हैं।
इसलिए जब बालीवुड म्युजिक पर गुलजार और इन्दीवर के गीत पढ़े तो एक बार फिर इन गीतों के साहित्यिक मूल्यों को और इनमें थरथराती संवेदनाओं को समझने-महसूस करने का मौका मिला। URL : http://lyrics.mywebdunia.com/2008/03/21/1206082195857.html
इसलिए तसलीमा को सलाम! काल चिंतन में मान्धातासिंह का ब्लॉग पढ़ा। मैं उन लोगों में शामिल हूँ, जो यह मानते हैं कि तसलीमा नसरीन एक औसत दर्जे की लेखिका हैं। पहली बार जब वे अपने उपन्यास लज्जा के कारण सुर्खियों में आई थीं तब मैंने बड़ी हसरत से पढ़ना शुरू किया था और बड़ी मुश्किल से इसे पूरा कर पाया था। तब मुझे ऐसा लगा था कि इसमें ऎसा क्या है जिसकी वजह से यह चर्चा में है। इसमें न तो भाषा को लेकर सचेतपन है और न ही अपनी बात को नए ढंग से लिखने का जोखिम। कहानी लगभग सपाट है और यथार्थ की रूढ़ अभिव्यक्ति है।
लेकिन, मैं तसलीमा को इसलिए सलाम करता हूँ कि वे अपने लेखन के प्रति न केवल प्रतिबद्ध हैं बल्कि निरन्तर रचनारत हैं। जर्मनी के लेखक हाइनरिख ब्योल ने लिखा है कि एक रचनाकार की मृत्यु उसकी सबसे खराब रचना में नहीं होती बल्कि तब होती है, जब वह रचने की अनिवार्य जोखिम लेना छोड़ देता है। कहने दीजिए तसलीमा ने रचने का अनिवार्य जोखिम बखूबी उठाया है और वे तमाम प्रतिकूल परिस्थियों में लगातार लिख रहीं हैं। अपने आंतरिक और बाहरी यथार्थ के हा-हाकार को वे जैसा भी रच रही हैं, वह इस मायने में अर्थ रखता है कि उनका लेखन निर्भीक का लेखन है।
पश्चिम बंगाल सरकार ने उनके साथ अपमानजनक व्यवहार किया है। उनका यूँ हमारा देश छोड़कर जाना हमारे लिए शर्मनाक है। URL : http://chintan.mywebdunia.com/2008/03/19/1205949520323.html -रवीन्द्र व्यास
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