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...उतनी बुरी नहीं है दुनिया
-विनय उपाध्या

शुक्रवार को भोपाल के दुष्यंत कुमार पांडुलिपि संग्रहालय द्वारा मशहूर शायर गीतकार निदा फाजली को सम्मानित किया जा रहा है। खासे मसरूफ रहने वाले इस शायर ने इस प्रतिनिधि से खुले मन से बातें की। सदा की तरह ताजा दम। हाजिर जवाब, मुखर लेकिन हर बात तर्कों के साथ पेश करने में माहिर। पुख्ता याददाश्त के धनी और पहचान के मुताबिक मुकम्मिल शायर और यारबाज।

याद आती है उन्हीं की एक नज्म- 'धरती और आकाश का रिश्ता/ जुड़ा हुआ है/ इसीलिए चिड़िया उड़ती है/ इसीलिए नदियाँ बहती हैं/ रात और दिन के बीच/ कहीं सपना जिंदा है/ मरी नहीं है/ अब तक ये दुनिया...जिंदा है।' यह सच है कि निदा फाजली की कलम आज उदास हो रही दुनिया के लिए एक आश्वासन की तरह है।

वह अपने समय को चुनौती देती है और समय में ही जीवन की स्थापना भी करती है। तभी तो आज के आतंक से जुड़े जलते सवाल पर वे फरमाते हैं- आतंक की कोई सरहद, कोई भाषा, कोई धर्म-जाति, नाम और भाषा नहीं। हर युग में उसकी छाया रही है लेकिन हर दौर में रावण हैं, तो राम भी हैं। कंस हैं, तो कृष्ण भी हैं। हमें खुद अपने भीतर प्रतिकार की ताकत जुटाना होगी। बुझा मन लेकर जिंदगियाँ नहीं जी जातीं, जितनी बुरी कही जाती है, उतनी बुरी नहीं है दुनिया...।

यह जिज्ञासा प्रायः बनी रहती है कि निदा खुद को किस निगाह से देखते हैं। इस ख्वाहिश के साथ 'दीवारों के बीच' पन्नो पलटे जा सकते हैं जिसमें निदा खुद एक किरदार की मानिंद जिंदगी के पोशीदा पहलू खोलते हैं। यहाँ निदा अपनी, अपने कुटुम्ब, अपने पड़ोस और दुनिया की सरहदों तक से रिश्ता जोड़ते अनुभवों का जखीरा लिए आपसे रूबरू हो सकते हैं।

जमीनी दायरों से जोड़कर देखें तो निदा का ताल्लुक ग्वालियर, दिल्ली और मुंबई से रहा है लेकिन यायावरी के चलते उनके पाँव अपने मुल्क ही नहीं, समंदर पार के पड़ाव भी नापते रहे। हर लम्हा कुछ नया, चमकदार और असरदार बटोरते हुए नई लहक-महक के साथ पेश करने की फितरत। कभी नज्म, गजल तो कभी गीत-दोहे। और इन दिनों गजल में उनका मन खूब रम रहा है। इस नई करवट को लेकर निदा का कहना है- 'मैं छंद का विरोधी नहीं हूँ। पर अपने को कभी एक लेखक ने सिमटाकर नहीं रखना चाहिए। कोई भी कवि पूरे संसार को कभी कह नहीं पाया। भला मेरी क्या हस्ती है। लिहाजा मैंने गजल लिखना शुरू कर दिया।'

बहरहाल, कविता हो या गजल, निदा फाजली की लेखनी का मिजाज अपने आपमें निराला है। कभी सख्ती, कभी मासूमी तो कभी सूफियाना, मनमौजी उनके कलामों में उतर आती है। सूरज, आँगन, माँ-बहन-बच्चे, दरख्त, चिड़िया और मौसम का जिक्र जब वे करते हैं तो मिट्टी की गंध और ताजा महक का करिश्माई स्वाद रगों में उतर आता है। और यह देशी ताना-बाना भाषा की जिस सोहबत में हम तक पहुँचता है वह निश्चित ही निदा फाजली की गाढ़ी कमाई है जिसे उन्होंने मुसलसल माँजा है।

ऐसी भाषा, जो सबका दामन थाम लेती है, जिसमें सबको अपना अक्स झिलमिलाता दिखाई देता है जिसमें हमारी-आपकी सबकी आवाजों का सरगम गूँजता है। कह सकते हैं जीवन और जड़ों से सिंचित भाषा जो कविता में जड़कर जिंदगी का ही एक हिस्सा बन जाती है। यहाँ निदा फाजली एक सवाल के जवाब में अपनी बेलौस राय जाहिर करते हैं-'कबीर को क्या मानते हैं आप? खुद कबीर कहते हैं कि उन्होंने स्याही-कागज को कभी छुआ नहीं। कहीं भाषा की ग्रामर पढ़ने नहीं गए। मगर उनकी सधुक्कड़ी भाषा ने जो महान कविता विरासत में दी उस पर हमें नाज है।

दरहकीकत यह आम आदमी की भाषा में कही-बोली गई कविता है। मैं खुद ऐसी ही भाषा तलाश करता रहा हूँ।' निदा फाजली ने इसी रौ में दुष्यंत को याद किया। फख्र जाहिर किया कि उन्हें (निदा) इस शायर के नाम से भोपाल के एक संग्रहालय ने अवॉर्ड दिया है। निदा की नजर में दुष्यंत कुमार आजाद भारत के साहसी और प्रयोगधर्मी कवि थे जहाँ से कविता ने नया रुख किया। अज्ञेय तक जो कविता ड्राइंग रूम तक सिमटी थी, दुष्यंत ने उस कविता का नया संस्कार कर जनता के बीच उसे प्रतिष्ठित किया। हिन्दी-उर्दू को पास-पास लाकर उन्होंने कविता में गंगा-जमुनी तहजीब को तवज्जो दी।

निदा फाजली के अनुसार दुष्यंत भले ही बिजनौर (उत्तरप्रदेश) की पैदावार हों, पर उनकी कविता भोपाल के उस युग की उपज है, जब यहाँ तरक्की पसंद शायरों का मजमा जमता था। इस लिहाज से दुष्यंत को मैं प्रगतिशीलता की देन मानता हूँ जिन्होंने सदा आम आदमी के हक में लिखा। मैं भी अपने को दुष्यंत कुमार की विचारधारा का ही राइटर मानता हूँ।

इस कथन के आसपास निदा की लेखनी का चेहरा निहारें तो उसके भीतर पैठने के लिए अवाम को बहुत जहमत नहीं उठाना पड़ती। अल्फाज बड़े नहीं होते, लेकिन बात बड़ी जरूर होती है। किसी स्कॉलर की पसंद होता है यह शायर तो एक राहगीर की जुबाँ पर भी उनके शेर चस्पां होने की काबिलियत रखते हैं।

यूँ एक बड़ा फलसफा है उनकी शायरी का जिसमें भारतीय जीवन अपने पूरी देशीपन के साथ नमूदार होता है। तब जबकि सारा जहाँ उत्तर आधुनिकता की चकाचौंध में अपने अतीत और रवायतों से आँखमिचौनी कर रहा है, लेकिन जैसी कि इस शायर की फितरत है- 'छोटा करके देखिए, जीवन का विस्तार, आँखों भर आकाश है, बाँहों भर संसार'। जिंदगी से मुँह फेरने की बजाय आरजुओं और उम्मीदों से लबरेज सदा एक-एक सुनहरा पैगाम टाँकने को वे आतुर दिखाई देते हैं, सूरज भी चमक रहा है, माँ लोरी गा रही है, बच्चे स्कूल जा रहे हैं।
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