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...वरना चित्रों में ही दिखेंगे टाइगर
संदीपसिंह सिसोदिया
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शक्ति का प्रतीक और बहादुरी की मिसाल माना जाने वाला जंगल का राजा बाघ आज अपने अस्तित्व की अंतिम लड़ाई में हमारा साथ चाहता है। अंतिम लड़ाई इसलिए क्योंकि ताजा अनुमान के मुताबिक आज भारत में बाघों की संख्या केवल 500 के लगभग रह गई है।

डर है कि भारत का गौरव, हिन्दुस्तान की शान कहा जाने वाला रॉयल बंगाल टाइगर आने वाले कुछ समय बाद केवल चित्रों व फिल्मों में ही दिखाई देगा। जनसंख्या के बढ़ते दबाव व मनुष्य की बढ़ती लालसा के चलते हर दिन जंगल नष्ट किए जा रहे हैं। वन्य प्राणियों के रहने की जगह खत्म होती जा रही है, जिससे जंगल के जीवन चक्र पर जबरदस्त आघात हुआ है। यानी जंगली क्षेत्र सिमटता जा रहा है व खाद्य श्रृंखला धीरे-धीरे टूटती जा रही है।

अब घटते शिकार व सिकुड़ते वन्य क्षेत्र के कारण खाने की तलाश में हिंसक पशु गाँवों की ओर आ जाते हैं और मवेशियों का शिकार करते हैं, नतीजतन बाघों और इनसानों की बढ़ती मुलाकातें, जिनमें अकसर कोई जान जाती है या तो किसी इनसान की या किसी बाघ की।

अगर इनसान मारा जाता है तो तुरंत ही पीड़ित के घरवालों को मुआवजा देकर और बाघ को नरभक्षी घोषित कर उसे मारने का फरमान जारी कर दिया जाता है, लेकिन अगर कोई बाघ इस घटना में मारा जाता है तो उसे मारने वाले को बहादुरी के तमगे दिए जाते हैं। अगर बाघ मवेशी मार डालता है तो अकसर उस मवेशी की अधखाई लाश को ढूँढ़कर उस पर जहर डाल दिया जाता है, जिससे अगर बाघ उसे फिर से खाए तो मारा जाए। अपनी सहज प्रवृत्ति के कारण बाघ शिकार को कहीं छिपाकर अगले दिन फिर खाता है और जहर की वजह से मारा जाता है।

यहाँ इस प्रसंग का यह मतलब कतई नहीं है कि किसी को अपनी आत्मरक्षा का अधिकार नहीं है। कहने का अर्थ यह है कि हम भी प्रकृति के उसी चक्र के अभिन्न अंग हैं, जिसके बाघ हैं। अब जब हम इस श्रृंखला में सबसे ऊपर हैं और प्रकृति प्रदत्त संसाधनों का सबसे ज्यादा उपयोग और उपभोग कर रहे हैं, हमारी जवाबदारी बनती है कि इस चक्र में अपने से नीचे वाली प्रजातियों को विलुप्त होने से बचाएँ।

अपनी सुनहरी पृष्ठभूमि पर काली धारीदार पट्टियाँ और शानदार फर वाली खाल ही बाघ की हमेशा से दुश्मन रही है। इस सुंदर खाल को बैठकों में बिछाना और सजाना रईसों की शान समझा जाता है, साथ ही विदेशों में बढ़ रही बाघों के आंतरिक अंगों की माँग ने भी इस राजसी प्राणी को संकट में डाल दिया है।

1970 में जब पता चला कि बाघों की तादाद एकाएक घटने लगी तब बाघों को बचाने के लिए भारत सरकार ने 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर शुरू किया था जिसे अब नेशनल टाइगर कंसर्वेशन अथॉरिटी बना दिया गया है, पर आज स्थिति यह है क‍ि लगभग सभी राष्ट्रीय पार्कों में वर्तमान में लगभग 33 प्रतिशत कर्मचारियों की कमी है। लालफीताशाही का आलम यह है कि इन लोगों को वेतन भी समय पर नही मिलता और इनमें से बहुत से रिटायरमेंट के करीब हैं तो बहुतों को 10 साल बाद भी स्थायी नहीं किया गया है। इस स्थिति का सबसे बुरा पक्ष यह है कि जब अपनी मांग़ों को लेकर असम के ओरांग़ नेशनल पार्क के कर्मचारियों ने कुछ दिनों की हड़ताल की तब उनकी अनुपस्थिति में ओरांग नेशनल पार्क में 2 बाघ मारे गए। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि इस सन्दर्भ में की गई अधिकांश तैयारियाँ नाकाफी हैं और बाघों को बचाने की सरकारी नीतियाँ बुरी तरह फेल हुई हैं।

वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड से सहायता पाने के बाद भी हालत यह है कि 2005 में पर्यटकों में मशहूर सरिस्का टाइगर रिजर्व में एक भी बाघ नही बचा। माना कि भारत में वन्य पशु संरक्षण कानून बहुत कड़े हैं, मगर इसका पालन बिरले ही होता है। सलमान खान केस को छोड़ दें तो पता चलेगा क‍ि भारतीय बाघ के सबसे कुख्यात शिकारी व वन्य जीवों की खालों के तस्कर लक्ष्मण पारदी भी अभी तक सजा मिलने का ही इंतजार कर रहा है। वन्य जीव संरक्षण कानून के अंतर्गत बाघ को मारने पर 7 साल की सजा का प्रावधान है, पर न्याय में होती इस देरी से निपटने के लिए विशेष तौर पर प्रस्तावित वन्यजीव अपराध शाखा के गठन पर अभी तक कोई कार्यवाही नहीं की गई है।

अब सवाल यह है कि आखिर इस होने वाली तबाही को कैसे रोका जाए। जंगल और वन्य जीवों को बचाना केवल सरकार की ही जिम्मेवारी नहीं है। इसका बीड़ा हर किसी को उठाना पड़ेगा। कब तक हम सिस्टम और नेताओं को दोष देते रहेंगे। आखिर सिस्टम हममें से कुछ लोगो ने ही बनाया है और नेता भी आम जनता से चुने जाते हैं।

सबसे पहले तो जंगल और उसमें रहने वाले प्राणियों के बारे में लोगों को जागरूक करना पड़ेगा। अगर सभी लोगों को इस समस्या के दूरगामी परिणाम पता होंगे तो निश्चित रूप से राजनैतिक पार्टियों के घोषणा-पत्रों में इस मुद्दे को भी प्रमुखता से स्थान मिलेगा और सत्ता में आने पर कोई ठोस कदम उठाया जाएगा।

जंगल और मनुष्य़ का नाता आदिकाल से रहा है, इसलिए इस आंदोलन में सबसे पहले जंगल से जुड़े क्षेत्रों के निवासियों को जोड़ना होगा। कोशिश करना होगी क‍ि इन स्थानों को ईको टूरिज्म के तौर पर विकसित किया जाए और स्थानीय निवासियों को इस परियोजना में ज्यादा से ज्यादा रोजगार के अवसर दें, जिससे उन्हें यह बात समझ आए क‍ि वन संरक्षण से वो आर्थिक रूप से मजबूत हो सकते हैं।

इसके लिए खेती के परम्परागत तरीकों के इस्तेमाल को बढ़ावा देना होगा, जंगल भूमि पर बसे समुदायों को शिकार व अन्य आपराधिक कार्यों से विमुख कर उन्हें शिक्षित कर जंगल से जुड़े रचनात्मक कार्यों के लिए प्रेरित करना होगा।

इसके अलावा जंगल टास्क फोर्स का गठन किया जाना चाहिए और उसे पुलिस के समकक्ष अधिकार दिए जाएँ, वन्य जीवों व जंगल से जुड़े मामलों के निपटारे के लिए विशेष ट्रिब्यूनल की स्थापना हो, सूखे व किसी भी आपदा जैसे क‍ि आग इत्याद‍ि पर तुरंत और प्रभावी कार्यवाही के लिए आपदा प्रबंधन टीमों का गठन होना चाहिए।

विभिन्न विभागों मे बेहतर तालमेल हेतु जवाबदारी निर्धारित करना होगी। अभी देखा जा रहा है पुलिस, स्थानीय प्रशासन व वन विभाग के बीच कोई तालमेल नहीं है, जिसका फायदा लकड़ी तस्कर उठाते हैं। हर वर्ष दिए जाने वाले लकड़ी या अन्य वन सामग्री एकत्रित करने के लिए दिए जाने वाले ठेकों की नियमित अंतराल पर जाँच होना चाहिए।

वन विभाग को बेहतर और आधुनिक साजो-सामान व और अधिकार दिए जाएँ, जिससे वो अवैध शिकारियों व लकड़ी तस्करों का मुकाबला कर पाएँ।

आम जनता को चाहिए क‍ि वह वन्य प्राणियों को दया व सहानुभूति की दृष्टि से देखे और ऐसे उत्पादों का बहिष्कार करे, जिन्हें बनाने में वन्य जीवों का इस्तेमाल किया गया है। गाहे-बगाहे गलती से शहरी क्षेत्र में घुस आए किसी भी जंगली जानवर को जान से न मारें। प्राकृतिक संतुलन के लिए लोगों को अधिकाधिक पौधारोपण के लिए प्रेरित करना चाहिए।

अकसर नेशनल ज्यॉग्राफी चैनल पर एक विज्ञापन आता है। उसमें बड़े ही सरल तरीके से बाघ और बैंगन का रिश्ता समझाया जाता है। सभी को पता है कि धरती पर जीवन के लिए पानी की सबसे ज्यादा जरूरत है और लगातार कटते जंगलों की वजह से वर्षा नहीं होती और जंगल इस वजह से कटते हैं क‍ि जंगल में बाघ नहीं। आखिर बाघ के डर से कोई भी जंगल जाने से कतराता है। जब बाघ ही नहीं होंगे तो कोई डर नहीं होगा और जंगल कट जाएँगे और जंगल नही होंगे तो वर्षा नहीं होगी और बिन पानी बैंगन तो उगने से रहा।

और अंत में कभी न कभी अपने परिवार को लेकर किसी राष्ट्रीय पार्क/अभयारण्य जरूर जाएँ, सीमेंट-कांक्रीट के जंगल तो हमेशा देखते हैं। एक बार प्रकृति की हरी-भरी गोद में अवश्य जाएँ तब पता चलेगा क‍ि प्रकृति ने छोटे-बड़े हर प्राणी को जंगल में उसकी जरूरतों के मुताबिक सब कुछ दिया है, जैसे एक माँ अपने सभी बच्चों को समभाव से पालती है तभी तो इसे माँ प्रकृति कहा जाता है।
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