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कस्बों से कम्प्यूटर क्रांति के मीठे फल
भारतीय भाषाओं के साथ विदेशों में स्वदेशी डंके
माइक्रोसॉफ्ट के अलावा रिलायंस कम्यूनिकेशंस, याहू, ओरेकल, टाटा इंडिकॉम, रेडिफ, ऐम्वे, एलजी, आईसीआईसीआई बैंक तक ऐसी सॉफ्टवेयर कंपनियों की सहायता से अपनी सेवाएँ दे रही हैं। स्वाभाविक है कि विभिन्न सेवाओं के लिए भारतीय युवा इंजीनियरों, भाषाई कर्मचारियों की आवश्यकता होगी।

इस बात की पुष्टि अपने छोटे से कस्बे उज्जैन में स्थापित महाकाल इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, कम्प्यूटर साइंस, फार्मास्युटिकल स्टडीज तथा मैनेजमेंट स्टडीज संस्थान को देखकर हुई। विज्ञान और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में करीब 2,000 छात्रों को शिक्षा-दीक्षा देने वाले इस संस्थान में इस अंचल के अलावा अन्य राज्यों से आने वाले युवाओं को प्रवेश मिल रहा है तथा बाद में तत्काल रोजगार के अवसर भी। इस शहर में दो दशक पहले मात्र सरकारी पोलीटेक्निक और इंजीनियरिंग कॉलेज हुआ करते थे।

दिग्विजय सरकार ने गैर सरकारी क्षेत्र में विज्ञान-प्रौद्योगिकी के संस्थान खोलने की छूट दी तो एमआईटी जैसे संस्थान आ गए। पचास एकड़ क्षेत्र में फैला यह संस्थान अमेरिका या यूरोप के किसी विश्वविद्यालय से कम नहीं लगता तथा युवाओं में गजब का आत्मविश्वास देखने को मिलता है। यहाँ भी चौंकाने वाली बात यह लगी कि फीस सरकार द्वारा नियंत्रित है और इंजीनियरिंग कम्प्यूटर विज्ञान की उच्चतम शिक्षा के लिए दिल्ली, मुंबई के किसी अच्छे पब्लिक स्कूल की वार्षिक फीस से कम फीस ली जा रही है।

निश्चित रूप से मध्यप्रदेश या उत्तर भारत के कई अन्य शहरों में संचार क्रांति के दर्शन होने लगे हैं। सांप्रदायिक तूफानों, भ्रष्टाचार और अपराध, राजनीतिक पतन के निराशाजनक दौर में इन कस्बों के उत्साही, प्रतिभाशाली और महत्वाकांक्षी युवा आशा की नई किरण जगाते हैं। संभव है, कमियों, कठिनाइयों और चुनौतियों का अंबार भी हो लेकिन सामाजिक गड़बड़ियों की भर्त्सना करते रहने वाले हम लोगों का एक कर्तव्य अच्छे प्रयासों की सराहना करना भी है। (हिन्दी आउटलुक से)
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