अपने पसंदीदा ब्लॉगों की सूची में अशोक टूटी हुई, बिखरी हुई, मोहल्ला, शब्दों का सफ़र, बुग्याल, कॉफ़ी हाउस, बेदखल की डायरी और ठुमरी का नाम शुमार करते हैं।
ब्लॉग विधा के बारे में अशोक कहते हैं कि यह एक रंगमंच की तरह है, जहाँ आपका सामना सीधे अपने पाठक से होता है। जिस तरह के परिवर्तनों और उथल-पुथल के वक्त में हम जी रहे हैं, जैसा विकट यह दौर है, यह नई विधा उसकी बेचैनी को अभिव्यक्ति की जमीन देती है कहीं-न-कहीं। ब्लॉगिंग के भविष्य या आने वाले समय में इसकी तस्वीर को लेकर अशोक किसी भी तरह की जल्दबाज राय बनाने के पक्ष में नहीं हैं। भविष्य की तस्वीर भविष्य ही बताएगा।
सबसे पहले तो ब्लॉग के माध्यम से खुद ग्लोबलाइज़ेशन के मायने लोगों को समझाए जा सकते हैं। उसके बाद उपयोगी सूचनाओं की हिस्सेदारी होनी चाहिए : ये सूचनाएँ बहुआयामी होनी चाहिए।
हिंदी ब्लॉगिंग की कमजोरियों और खामियों पर उँगली रखते हुए अशोक कहते हैं कि सबकुछ के बावजूद हिन्दीभाषी समाज अभी भी उतना खुला हुआ नहीं है। हमें बहुत ज़्यादा चीज़ों से परहेज़ है और बिना सुने-पढ़े चीज़ों को ख़ारिज कर देने और आत्मलीनता में घिसटते रहना हमें बहुत भाता है। इससे निजात पाए बिना बहुत सारे दोष लगातार हिन्दी के ब्लॉग-संसार को शापित बनाए रखेंगे। उनके विचार से ब्लॉग में विज्ञान पर बहुत कुछ लिखा जाना चाहिए। खासतौर पर युवा पाठकों को ध्यान में रखकर जो कुछ भी लिखा जाएगा, उसका एक किस्म का ऐतिहासिक महत्व भी होगा। पर्यावरण और पारिस्थितिकी पर गंभीर कार्य की अतल संभावनाएँ हैं।
अशोक कहते हैं, ‘पिछले कुछ दिनों से ब्लागिंग और साहित्य को लेकर तमाम तरह के वक्तव्य आ रहे हैं। कुछ दिन पहले किसी ब्लॉग पर बाकायदा किसी ने लिखा था कि पिछले कुछ दशकों से हिन्दी में कोई कुछ लिख ही नहीं रहा है। कोई कहता है ब्लॉग साहित्य से बड़ी चीज़ है। कोई कहता है साहित्य अजर-अमर है।’
‘हिन्दी की सबसे बड़ी बदकिस्मती यही रही है कि लोगों में पढ़ने की प्रवृत्ति धीरे-धीरे लुप्त होती गई है। माना कि हिन्दी के बड़े प्रकाशक अच्छी किताबों की इतनी कम प्रतियाँ छापते हैं (चालीस करोड़ भारतीयों द्वारा बोली जाने वाली हिन्दी के किसी 'बेस्ट सेलर' की आजकल अमूमन 600 प्रतियाँ छपती हैं) कि लोगों तक उनका पहुँचना मुहाल होता है। लेकिन हिन्दी को बचाने का कार्य छोटे-छोटे कस्बों से निकलने वाली पत्रिकाओं ने लगातार अपने स्तर पर जारी रखा है। इस समय हिन्दी में जितनी लघु पत्रिकाएँ निकल रही हैं, उतनी कभी नहीं निकलती थीं। यह इन लघु पत्रिकाओं की देन है कि हिन्दी लेखकों की कई पीढि़याँ एक साथ कार्यरत हैं। और यह कार्य इंटरनेट और ब्लॉग के आने से कई दशक पहले से चल रहा है।’
अशोक कहते हैं, ‘अब ब्लॉग आया है तो जाहिर है, वह भी अपनी जगह बनाएगा ही। लेकिन इसमें किसी दूसरे फॉर्मेट से प्रतिद्वंद्विता की क्या ज़रूरत है। ब्लॉग ने मनचाही रचना करने की स्वतंत्रता बख्शी है तो अभी थोड़े धैर्य के साथ इस औज़ार के गुण-दोषों को चीन्हे जाने की दरकार भी महसूस होती है।’
कबाड़खाना के बारे में अशोक कहते हैं, ‘हम लोगों ने जब कबाड़खाना शुरू किया तो जाहिर है हमने इसे एक नया खिलौना जानकर काफी शरारतें भी कीं, लेकिन धीरे-धीरे एक ज़िम्मेदारी का अहसास होना शुरू हुआ और साथ ही नए-नए आयाम भी खुले और अब भी खुल रहे हैं। मुझे यकीन है कि ऐसा ही ब्लॉगिंग में मसरूफ तमाम मित्रों को भी महसूस हुआ होगा।
वे कहते हैं, ‘सबसे बड़ी चीज़ यह है कि ब्लॉग हमें एक ऐसा प्लेटफॉर्म मुहैया कराता है, जहाँ हम अपनी पसन्द/नापसंद सभी के साथ बाँट सकते हैं। हम अपनी मोहब्बत भी बाँट सकते हैं और नफरत भी। हम विनम्रता बाँट सकते हैं और विनयहीनता भी। हम एक-दूसरे का तकनीकी ज्ञान भी बढ़ा सकते हैं (जैसा कि श्री रवि रतलामी और कई अन्य लोग लगातार करते रहे हैं और जिसके लिए उनका आभार व्यक्त करने को शब्द कम पड़ जाएँगे।)।
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