तो थोड़ा और आगे बढ़ते ही निकानोर पार्रा की एक तस्वीर के साथ उनकी कविता आ जाती है :
मेरी प्रेमिका मेरे चार अवगुणों के कारण मुझे कभी माफ नहीं करेगी : मैं बूढ़ा हूँ मैं गरीब हूँ कम्यूनिस्ट हूँ और साहित्य का राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुका हूँ
शुरू के तीन अवगुणों की वजह से मेरा परिवार मुझे कभी माफ नहीं कर सकेगा चौथे की वजह से तो हर्गिज़ नहीं
अमेरिका की प्रसिद्ध कवियत्री हाना कान की कविता भी तमाम कबाड़ के बीच पड़ी दिख जाएगी : मेरे दादाजी जूते और वोद्का दाढ़ी और बाइबिल भीषण सर्दियाँ स्लेजगाड़ी और अस्तबल
मेरी दादी नहीं था उसके पास अपनी बेटी के लिए दहेज़ सो भेज दिया उसे पानियों से भरे समुन्दर के पार
मेरी माँ दस घंटे काम करती थी आधे डॉलर के लिए हाड़ तोड़ देने वाली उस दुकान में मेरी माँ को मिला एक विद्वान
मेरे पिता वे जीवित रहे किताबों, शब्दों और कला पर, लेकिन ज़रा भी दिल नहीं था मकान मालिक के पास।
मैं मैं कुछ हिस्सा उनसे बनी हूँ कुछ हिस्से में दूने हैं वो हालाँकि तंग बहुत किया अपनी माँ को मैंने।
ये तो सिर्फ एक बानगी है कबाड़खाने की। ये सभी अनुवाद अशोक पांडे ने किए हैं। कबाड़ अगर ऐसा हो तो कौन नहीं, चाहेगा कि इस कबाड़ के बीच ही गुजर जाए तमाम उम्र।
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