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होगा कोई ऐसा भी कि गालिब को न जाने...!
गालिब के 210वें जन्म दिवस पर ‍िवशेष
- निर्मल शर्म
ऐसा कोई 'गाँठ का पूरा' ही होगा जो शायर असदउल्ला खाँ गालिब को न जानता हो। यह बात अलग है कि उनसे इत्तेफाक बहुत कम लोग रखते हैं, क्योंकि, 'शायर तो वह अच्छे थे, पर बदनाम बहुत हुए।' उनका जन्म 27 दिसंबर 1797 को हुआ था। नाम था असदउल्ला बेग खाँ।

...'कहते हैं, अगले जमाने में कोई मीर भी था।' गालिब के एक प्रशंसक जब लखनऊ गए तो गालिब की लिखी हुई कुछ उर्दू गजलें उस जमाने के उस्ताद शायर मीर को दिखाने के लिए अपने साथ ले गए।

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गालिब की गजलें देखकर मीर ने तंज किया- अगर इस लड़के को रास्ता दिखाने वाला कोई योग्य गुरु मिल जाए तो यह बहुत बड़ा कवि बन सकता है, वरना इसी तरह की निरर्थक बकवास लिखता रहेगा।

अपने पिता की मृत्यु के समय गालिब केवल चार साल के थे। पिता की मृत्यु के बाद उनका परिवार ताऊ नसरुल्ला बेग खाँ के संरक्षण में आ गया। गालिब का ननिहाल भी आगरे का ही था और संपन्न था। लिहाजा गालिब का शिक्षण ढंग से हो पाया। गालिब ने अपने स्कूली दिनों में केवल फारसी ही पढ़ी। गालिब को लिखना रास आया उर्दू जुबान में, हालाँकि फारसी में लिखा अधिक। 1812-13 में गालिब हमेशा-हमेशा के लिए आगरा छोड़कर दिल्ली आ गए।

गालिब ने अपने मदरसा-काल से ही लिखना प्रारंभ कर दिया था। गालिब का प्रारंभिक लेखन बहुत ही उलझा हुआ, जटिल और सामान्य ही रहा। परिणामतः उनकी खूब आलोचना हुई, उपहास हुआ, फिकरे कसे जाते रहे, मजाक उड़ाया जाता था, किंतु गालिब इन सबसे निराश नहीं हुए, बल्कि खुद को, अपनी शायरी को निरंतर माँजते गए।

  गालिब का ननिहाल भी आगरे का ही था, और संपन्न था। लिहाजा गालिब का शिक्षण ढंग से हो पाया। गालिब ने अपने स्कूली दिनों में केवल फारसी ही पढ़ी। गालिब को लिखना रास आया उर्दू जुबान में हालाँकि फारसी में लिखा अधिक। 1812-13 में गालिब हमेशा के लिए आगरा छोड़ दिया      
1841 में उनका उर्दू 'दीवान' पहली बार प्रकाशित हुआ। इस छोटी सी पुस्तक में उनके तकरीबन 1100 शे'र सम्मिलित हुए थे। कुछ समय बाद 1845 में उनका फारसी 'दीवान' भी आ गया। तुलनात्मक रूप से यह पुस्तक बहुत बड़ी थी। इसमें लगभग 6,700 शे'र सम्मिलित थे। इन दोनों ही पुस्तकों के आ जाने के बाद उनकी ख्याति उर्दू और फारसी के शायर के रूप में हो गई थी।

दोस्त और दुश्मन दोनों ने ही उन्हें एक शक्ति के रूप में स्वीकार कर लिया था। वे प्रतिष्ठित हो चुके थे। सन्‌ 1847 में उर्दू 'दीवान' का दूसरा संस्करण प्रकाशित हुआ। उससे जाहिर है कि गालिब साहित्य के क्षेत्र में तेजी से लोकप्रियता प्राप्त कर रहे थे।

फिरोजपुर, झिरका और लोहारू के नवाब अहमदबख्श खाँ गालिब के ताऊ ससुर होते थे। नवाब अहमदबख्श खाँ का दिल्ली के शाही दरबार में अच्छा खासा रुतबा था। सो शाही दरबार में गालिब का प्रवेश तथा परिचय आसान हो गया, आवाजाही और लोकप्रियता बढ़ती गई।

बहादुरशाह का उर्दू जुबान पर न केवल अधिकार था, बल्कि वे अपने समय में उर्दू शायर के रूप में खासे लोकप्रिय हो गए थे। 'जफर' उनका तखल्लुस था। गालिब को अपनी जगह बनाने के लिए काफी जद्दोजहद करना पड़ी।
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