-चन्दन मिश्रा कांग्रेस नीत संप्रंग सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे वाम दलों ने एक बार फिर सरकार को धमकाने की कवायद शुरू कर दी है। नन्दीग्राम मुद्दे पर आलोचनाओं का दौर थमते ही माकपा पोलित ब्यूरो के अध्यक्ष प्रकाश करात ने राग अलापना शुरू कर दिया है कि यदि मनमोहन सरकार परमाणु समझौते पर आगे बढ़ी तो वे समर्थन वापस ले लेंगे।
यह पहली बार नहीं है कि गठबंधन के किसी दल ने सरकार गिराने की धमकी दी हो। परमाणु मुद्दे पर जब से भारत और अमेरिका में समझौता हुआ है, तब से ही वाम दलों ने इस पर अपनी भृकुटियाँ तान रखी हैं। वे सरकार को लगातार 'बैकफुट' पर धकेलने की कोशिश करते रहे हैं। यह दुस्साहस सिर्फ परमाणु मामले में ही नहीं वरन पेट्रो उत्पादों की कीमतें बढ़ाने, विदेशी निवेश एवं निवेशकों को प्रोत्साहन दिए जाने के मामले में भी जारी है।
भारतीय राजनीति में गठबंधन सरकारों की जब से शुरुआत हुई है तब से ही समर्थन दे रहे दलों की मनमानी और सरकार गिराने की धमकियाँ देने का भी सिलसिला चल रहा है। सरकार गिराने और समर्थन वापसी की कुछ धमकियाँ तो यथार्थ में भी बदलीं और केंद्र सरकारों समेत कई राज्यों की सरकारें इस मनमानी के चलते औंधे मुँह गिरी।
भारतीय राजनीति के इतिहास में गठबंधन राजनीति की शुरुआत पहली बार जयप्रकाश नारायण ने की थी। इमरजेंसी के बाद जब कांग्रेस पार्टी पर से लोगों का भरोसा उठा तो उसका फायदा सिर्फ जनसंघ को ही नहीं मिला बल्कि उस लहर ने कई क्षेत्रीय पार्टियों को सत्ता में भागीदारी का मौका दिलाया। जयप्रकाशजी ने सब को एक साथ लेकर स्थिर सरकार बनाने की कोशिश की पर उनका यह प्रयास जल्द ही दम तोड़ने लगा और सिर्फ तीन साल के भीतर ही सरकार अल्पमत में आ गई। इसका सीधा-सा अर्थ यह था कि गठबंधन की राजनीति भारतीय परिवेश में सही से पनप नहीं पाई।
इसके बाद पुन: सन 1989 में वीपी सिंह के नेतत्व में तीसरे मोर्चे की सरकार बनी। पर गठबंधन राजनीति के बल पर सत्ता पर लम्बे समय तक काबिज होना इस बार भी दिवास्वप्न ही साबित हुआ और वीपी सिंह की सरकार भी दो साल के भीतर धराशायी हो गई। उस दौरान कई राज्यों में भी ऐसा ही प्रकरण दोहराया गया। हालाँकि इसके बाद केंद्र में सत्ता एक बार फिर कांग्रेस के टिकाऊ हाथों में पहुँच गई, परंतु अगले ही चुनावों में यह सिलसिला दोबारा से चल निकला। पहले देवेगौड़ा और फिर इंद्र कुमार गुजराल गठबंधन राजनीति के साये में जितनी जल्दी प्रधानमंत्री बने, उससे भी जल्दी इससे हाध धो बैठे.
इस क्रम में सबसे ज्यादा जिल्लत तो भाजपा सरकार को सहनी पड़ी। अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बनी सरकार पहले 13 दिन और फिर 13 महीने में घराशायी हुई और इसका सबब भी बनी गठबंधन राजनीति। उस समय भी भाजपा को समर्थन दे रहे दलों के निजी हित सरकार को लील गए। किसी को मनमाफिक मंत्रालय चाहिए था तो कोई अपनी पार्टी के ज्यादातर सांसदों को मंत्रिमंडल मे स्थान दिलाना चाहता था।
हालाँकि उसके बाद वाजपेयी की अगुवाई में एक बार फिर गठबंधन बना और राजग के नाम से पाँच साल तक शासन चलाने में सफलता हासिल हुई। पर इस दौरान भी गठबंधन की विभिन्न पार्टियों की माँगों ने सरकार को चैन से बैठने नहीं दिया। कभी ममता बैनर्जी अपनी माँगों को लेकर गठबंधन से अलग हुई, तो कभी वाजपेयी ने इस खींचतान से तंग आकर पद छोड़ने तक की धमकी दे डाली।
यही हाल मौजूदा समय में भी जारी है। कर्नाटक में जनता दल(एस) और भाजपा ने आपसी समझ के आधार पर गठजोड़ स्थापित किया। फैसला हुआ कि 20-20 महीने तक दोनों पार्टियों के मुख्यमंत्री रहेंगे। पर 20 महीने पूरे होत ही जनता दल(एस) का गठबंधन धर्म जवाब दे गया और उसके सत्ता लालच ने राज्य को फिर से चुनाव के भँवर में धकेल दिया। यही हाल मौजूदा केंद्र सरकार का है। वामदल लगातार सरकार को सरकार गिराने की धमकी दे रहे हैं। अपने चार साल पूरे कर चुकी संप्रग सरकार नहीं चाहती कि उसे मध्यावधि चुनावों की मार झेलनी पड़े, अत: वह भी वामदलों की मनमानी सह रही है।
पर इस सबसे एक बात तो साबित होती है कि जयप्रकाश नारायण द्वारा सरकार बनाने के लिए शुरू की गई गठबंधन प्रणाली ने भारतीय राजनीति के लिए वरदान की जगह अभिशाप बनती जा रही है। गठबंधन सरकार चाहे अपने पाँच साल पूरे कर भी ले, पर वह एक पूर्ण सरकार नहीं बन पाती। यह बात वाजपेयी सरकार के समय में भी साबित हुई थी और यही बात मौजूदा गठबंधन भी सिद्ध कर रहा है।
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