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अनामदास का नामी ब्‍लॉग
ब्‍लॉग-चर्चा में आज अनामदास का चिट्ठा
मनीषा पांडेय
नामियों-गिरामियों के चिट्ठों की चर्चा के बाद आज कुछ अनाम बातें की जाएँ। ब्‍लॉग-चर्चा का अगला पड़ाव ऐसा ही एक अनाम ब्‍लॉग है। ब्‍लॉगर का परिचय सिर्फ इतना ही है कि वो पत्रकार हैं। बाकी उनका परिचय उनकी कलम देती है, उनका लिखा हुआ देता है।

अनामदास का चिट्ठा हिंदी के कुछ बहुत लोकप्रिय और पढ़े जाने वाले चिट्ठों में से है। अलग हटकर चुने गए विषयों पर लिखी हर पोस्‍ट की भाषा में एक खास रवानी है। विषयों का चुनाव बस यूँ ही कुछ लिखने के लिए लिख दिया गया जैसा मसला नहीं है। हर पोस्‍ट के पीछे एक विचार है, एक बात है, जो कहने की कोशिश की जा रही है।

बौद्धिक रूप से थोड़ी भी समृद्ध और बेहतरीन पठनीय सामग्री की तलाश कर रहे लोगों के लिए इस अनाम चिट्ठे पर बहुत कुछ है। एक पोस्‍ट 'जो हो न सका, उसकी तलाश है मुझे' में वे लिखते हैं :

कुछ लोग दावा करते हैं कि उन्हें उनके जीवन का उद्देश्य मिल गया है-- देशसेवा, गौसेवा, जनसेवा, हिंदीसेवा से लेकर कारसेवा और अब नेटसेवा तक। मुझे कोई उद्देश्य नहीं मिला है, जिस तरह जीता हूँ उसे उद्देश्य कहने का हौसला मुझमें नहीं है

मुझे जीवन का उद्देश्य तो नहीं पता लेकिन जिसे आभासी दुनिया कहा जाता है वहाँ मैंने स्वेच्छा से जन्म लिया। स्वयंभू हूँ, हर्मोफ़र्डाइट हूँ--एककोशीय जीव, जो ख़ुद से टूटकर बना है

  अलग हटकर चुने गए विषयों पर लिखी हर पोस्‍ट की भाषा में एक खास रवानी है। विषयों का चुनाव बस यूँ ही कुछ लिखने के लिए लिख दिया गया जैसा मसला नहीं है। हर पोस्‍ट के पीछे एक विचार है, एक बात है, जो कहने की कोशिश की जा रही है।      
ऐसी ही एक और रोचक पोस्‍ट 'नवरात्र में शेर और स्‍कूटर पर सवार माताएँ' में वे लिखते हैं :

'नवरात्र चल रहा पुण्यभूमि भारत में। नारी शक्ति की आराधना उत्कर्ष पर है। एक ऐसे देश में जहाँ शाम ढलने के बाद बाहर निकलने में महिलाओं को डर लगता है। भारत विडंबनाओं और विरोधाभासों का देश है, इसकी सबसे अच्छी मिसाल नवरात्र में देखने को मिलती है जब लोग हाथ जोड़कर माता की प्रतिमा को प्रणाम करते हैं और हाथ खुलते ही पूजा पंडाल की भीड़ का फ़ायदा उठाने में व्यस्त हो जाते हैं।
भारत का कमाल हमेशा से यही रहा है कि संदर्भ, आदर्श, दर्शन, विचार, संस्कार सब भुला दो लेकिन प्रतीकों को कभी मत भुलाओ।'
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