रिजर्व बैंक ने व्यक्तियों, कंपनियों और विदेशी फर्मों के लिए विदेशों में निवेश नियमों को और उदार बनाते हुए विदेशी मुद्रा देश से बाहर ले जाने का मार्ग प्रशस्त कर दिया है, ताकि बाजार में डॉलर का दबाव कम हो और रुपए की मजबूती पर कुछ हद तक अंकुशा लग सके।
उदारीकृत योजना के तहत व्यक्तियों को एक लाख की बजाय दो लाख डॉलर तक विदेशी मुद्रा ले जाने की अनुमति दे दी है तथा म्यूच्युअल फंडों के लिए विदेशों में विनिवेश करने की वर्तमान 4 अरब डॉलर की सीमा को बढ़ाकर 5 अरब डॉलर कर दिया गया है।
लेकिन यह विचारणीय है कि जब विदेशी निवेशक भारी मात्रा में भारत में डॉलर उँडेल रहे हैं तब भला म्यूच्युअल फंड किस प्रकार से और कितना, भारत के बढ़ते डॉलर प्रवाह को उलीच सकेंगे। रिजर्व बैंक विदेशी पूँजी की आवक रोकने के लिए ब्याज दरों में कटौती पर भी विचार कर सकती है, ताकि यहाँ निवेशक ब्याज भिन्नता (भारत में अधिक ब्याज की दर और विदेशों में कम) का अधिक लाभ कमाने के लिए भागे-भागे न आएँ।
विचित्र बात यह है कि जहाँ चिदंबरम रुपए की मजबूती के संबंध में तटस्थ रवैया अपनाए हुए हैं, वहीं वाणिज्य मंत्री कमलनाथ निर्यातकों के समर्थन में रुपए के अवमूल्यन की ओर संकेत दे रहे हैं। वास्तविकता यह है कि निर्यात के मोर्च पर देश को नुकसान अवश्य होता है, लेकिन आयात के संबंध में अधिक लाभ होता है।
सस्ते आयातों से उत्पादों की लागत घटती है और भारतीय उत्पाद बाजार में प्रतिद्वंद्वी होने की क्षमता रखते हैं। साथ ही, मुद्रास्फीति पर भी दबाव कम होता है। ज्ञातव्य है कि ऊँची कीमतों में कच्चे तेल के भारी आयात के कारण हमारी अर्थव्यवस्था पर सदैव खतरा मँडराता रहता है।
दूरगामी नजरिए से मजबूत मुद्रा का एक लाभ यह भी होगा कि भारतीय अर्थव्यवस्था विदेशी अर्थव्यवस्था के उतार-चढ़ाव का सामना कर सकेगी। ऐसी विदेशी मुद्र्रा बाहर जाने के दरवाजे खोलने के संबंध में वित्तीय रणनीतिकारों को यह सुनिश्चित करना होगा कि पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार को सुरक्षित रखा जाए।
उल्लेखनीय है कि रिजर्व बैंक ने पूँजीगत खाते में रुपए को पूर्ण परिवर्तनीय बनाने वाली तारापोर समिति की सिफारिशों पर अमल और तेज कर दिया। सिफारिशों के अनुरूप ही रिजर्व बैंक ने रुपए की मजबूती पर अंकुश लगाने के लिए सीधे बाजारों में हस्तक्षेप करने की बजाय दूसरे विकल्प अपनाते हुए देश से बाहर डॉलर ले जाने के दरवाजे खोल दिए।
लेकिन जैसा कि तारापोर समिति ने कहा है कि रुपए के पूँजी खाते में परिवर्तनीय बनने के पूर्व मुद्र्रास्फीति (महँगाई) और बजटीय घाटे का दबाव कम करना होगा। इस कटु सबक को भी नहीं भुुलाया जाना चाहिए कि नब्बे के दशक में जिन-जिन देशों ने पूँजी खाते में अपनी मुद्रा को परिवर्तनीय बनाया, उन्हें भारी वित्तीय संकट से गुजरना पड़ा।
इतना ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय सटोरिए भी रुपए की विनिमय दर के उतार-चढ़ाव में नाना प्रकार से दृश्य और अदृश्य खेल खेलेंगे। जब मुद्रा सटोरिए के हाथों में लेन-देन का खिलौना बन जाएगी तब वित्तीय संकट का सामना भी करना पड़ सकता है।
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