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आँख गीली किए बगैर कुछ शब्द
अफजल साहब की याद में
यह ठीक उतना ही निष्करुण और क्रूर व्यवहार था, जैसे कोई चाकू घोंपने के पहले देख ले और वह उसे न घोंपने का वादा करे। और, जैसे ही वह अपना मुँह फेरे, लगे-हाथ वह फिर से उस पर वार कर दे। उस वार के बाद मुड़कर देखने में जो चेहरे पर पीड़ा होती है, ठीक वही पीड़ा मुझे उनके चेहरे पर उस दिन दिखाई दे रही थी, जब वे अस्पताल में लेटे थे। और, छत की तरफ हतप्रभ होकर देख रहे थे।

आज उनकी उन्हीं पीड़ाग्रस्त आँखों को याद करते हुए, मैं अपनी आँख को गीली होने से बचाते हुए पूछना चाहता हूँ ये सवाल ''क्या संसार से कोई कलाकार अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराए बगैर इतिहास की धूल के नीचे दब जाता है?'

अफजल साहब से पहली मुलाकात

मुझे पहली बार अफजल साहब को 'देखे' जाने की याद है। देवास में एक आदमी तेजी से मुड़ रहा था। देवास में विष्णु गली की तरफ अँधेरे में। किसी ने कहा है 'ये अफजल साहब है। चित्रकार।' वे अकेले जा रहे थे। अँधेरे में। खोए हुए से। उनके हाथ में लंबी-सी टॉर्च थी। टॉर्च की लम्बाई देखकर लगता था जैसे वे अँधेरे के ही हाथ-पैर तोड़ने के लिए निकले हों।

वे लगभग छः हज़ार पेंटिंग छोड़ गए हैं। लेकिन, उनका जितना भी काम ले-जाकर मैंने बाहर की कला-दीर्घाओं या समूह प्रदर्शनियों में प्रदर्शित किया, उस काम ने हर प्रेक्षक और कलाकार को हक्का-बक्का कर दिया
वैसे भी अफजल साहब उन दिनों काया से 'कलाकार' कम, 'पहलवान' अधिक दिखते थे। आर्मी के जूते। पुलिस की पेंट और इस सब पर संगीतकारों वाला मलमल का कुर्ता। कहीं कोई संगति नहीं। जबकि, अखाड़ेबाजी न केवल स्वभाव में थी, बल्कि उनका घर भी दो अखाड़ों के बीच था।

हालाँकि, यह एक किस्म की विडंबना है कि लोगों ने उनका बहुत कम काम देखा है, मैंने खुद भी उनका समूचा काम नहीं देखा, क्योंकि वे लगभग छः हज़ार पेंटिंग छोड़ गए हैं। लेकिन, उनका जितना भी काम ले-जाकर मैंने बाहर की कला-दीर्घाओं या समूह प्रदर्शनियों में प्रदर्शित किया, उस काम ने हर प्रेक्षक और कलाकार को हक्का-बक्का कर दिया।

आज जबकि 'कागज-कैनवास पर बिखरी अपरिप-समझ' को ही 'कृति' का दर्जा देकर उसे सरकारी-गैर सरकारी कलादीर्घाओं की दीवारों पर लटकाकर 'महानता' से अभिषेकित करने का कुटिल काम चल रहा हो, वहाँ स्व. अफजल की हर कृति आपका कंधा झकझोरकर यह बताती है कि कला और कलर्ड गारबेज के बीच क्या फर्क है। हम व्याख्याओं की शर्मनाक भाषा-निवेश में फँसकर, अगर यह मोटा-सा फर्क नहीं समझ पा रहे हैं तो यह हमारा और हमारे समय की कला का दुर्भाग्य है।
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