दरअसल, वे 'सीधे और सरल आदमी' की आड़ी-तिरछी जीवन-रेखा थी। मैं कार्डियोग्राम देखकर समझ रहा था कि किस कदर उनकी हार्ट-बीट मिस हो रही है। मेरा संशय गलत नहीं था। वहाँ अचीन्ही-सी लिपि में मृत्युलेख लिखा जा रहा था। शाम को ख़बर मिली। उन्होंने संसार से अंतिम विदा ले ली है।
| दरअसल, वे 'सीधे और सरल आदमी' की आड़ी-तिरछी जीवन-रेखा थी। मैं कार्डियोग्राम देखकर समझ रहा था कि किस कदर उनकी हार्ट-बीट मिस हो रही है। मेरा संशय गलत नहीं था। वहाँ अचीन्ही-सी लिपि में मृत्युलेख लिखा जा रहा था |
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अफजल जैसे चित्रकार पर लिखना कमोबेश किसी के लिए भी काफी कुछ कठिन-सा लगता है कि उनका जो कुछ हो सकता था और हो सकता है, वह सिर्फ 'रंग' ही है। वहाँ रंग से बाहर और ऊपर कुछ भी नहीं है। अलबत्ता, कहना चाहिए कि बहुत शुरू से ही तमाम 'भरोसों' पर से उनका 'भरोसा' उठ चुका था। या यह कह लें कि उन्होंने इरादतन उठा लिया था। मुहावरे के विपरीत यह उनका 'विलिंग सस्पेंशन ऑव बिलीफ' था। यकीन को इरादतन मुअत्तल करना।
| उन्होंने अपनी हथेलियों से 'रंगों के दाग' कभी छूटने नहीं दिए थे। मुझे लगता है, उनकी हथेली खोलकर यदि उनकी जीवन-रेखा देखी जाती, तो उसमें आरंभ से अंत तक रंग और लिसिंड ऑइल या टरपेंटाइन ही मिलते
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कदाचित इसी कारण समकालीन चित्रकार बिरादरी के बीच हमारे समय के वे एकमात्र और नितांत अकेले, ऐसे उदाहरण थे, जिसने अख़बारों के पृष्ठों पर फड़फड़ाती प्रशंसाओं और सरकारी कला-प्रासादों के सभागारों में बजती तालियों की तरफ कान दिए बगैर कोई आधी-शताब्दी से निरंतर खुद को अपनी कला के काम में जोते रखा और साथ ही यह भी कि कभी किसी से कोई शिकायत भी नहीं की।
स्वर्गीय अफजल के लिए यदि इतने रुँधे हुए गले से अपने शब्दों में, डबडबाती भाषा में मैं आज बात कर रहा हूँ तो इसलिए कि उन्होंने अपनी हथेलियों से 'रंगों के दाग' कभी छूटने नहीं दिए थे। मुझे लगता है, उनकी हथेली खोलकर यदि उनकी जीवन-रेखा देखी जाती, तो उसमें आरंभ से अंत तक रंग और लिसिंड ऑइल या टरपेंटाइन ही मिलते।
कभी-कभी तो इस कारण भद्रजन उनके टरपेंटाइन-लिसिंड ऑइल की गंध से भरे हाथों को मिलाने से ख़ुद को बचाते हुए दूर से ही नमस्कार कर लेते थे? नजाक़त और नफासत-पसंद लोग उनके हाथों को देखकर उनसे हाथ मिलाने का इरादा बदल देते थे।
मेरा पक्का यकीन है कि मौत नफासत-पसंद कतई नहीं है, उसने अफजल साहब का हाथ थामने के पहले रंग से सने हाथों को नहीं देखा और उन्हें थामकर अपने साथ लिए चली गईं। निश्चय ही चलने के पहले उन्होंने मौत की तरफ ऐसे ही देखा होगा कि 'यह क्या? पक्षाघात के समय दी गई मोहलत का क्या हुआ? ये कैसी वादा-खिलाफी है?'
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