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आँख गीली किए बगैर कुछ शब्द
अफजल साहब की याद में
मुझे याद आया, कुछ दिन पहले ही तो उन्होंने कहा था- 'बस इस बार अक्टूबर आने वाला है, इस बार तू तैयार रहना। यार प्रभु, अक्टूबर की तिरछी और चमकीली धूप से बढ़कर कोई भी दूसरी ऐसी खूबसूरत चीज इस जहान में नहीं है, जो मुझे पागल कर दे। कमबख्त कवियों को चाँदनी प्यारी होती होगी, पर मुझे तो धूप उथल-पुथल कर देती है। सूरज से मैं फरियाद करता हूँ कि वो धूप को मुसलसल गिराता रहे।'

अक्टूबर की तिरछी और चमकीली धूप से बढ़कर कोई भी दूसरी ऐसी खूबसूरत चीज इस जहान में नहीं है, जो मुझे पागल कर दे। कमबख्त कवियों को चाँदनी प्यारी होती होगी, पर मुझे तो धूप उथल-पुथल कर देती है
'तो फिर आप चाँदनी रात का लैण्डस्केप तो कभी बनाएँगे ही नहीं।' मैंने थोड़ा संदेह प्रकट किया था, तो वे तपाक से बोले थे यार तू ही बता, चाँदनी दरअसल है क्या? चाँद से टकराकर लौटी धूप ही तो है, भई। सुन, मैं तो हर उस स्पॉट को पेंट करना चाहता हूँ, जहाँ एक छोटा-सा 'दीया' भर भी रोशनी दे रहा हो।' दरअसल, वे कहीं भी, कभी भी और कैसी भी परिस्थिति में लैण्डस्केप कर सकते थे। धूप में। अँधेरे में। बारिश में।

दिन के उस क्षण में यह सोचकर मैं किचिंत उदास हो आया था कि यह सब कितना विडंबनापूर्ण है कि इस समय अक्टूबर की धूप देवास के चप्पे-चप्पे पर गिर रही है और वे उससे दूर यहाँ 'अपोलो' में लेटे हुए हैं। कुछ देर पहले बतरस की इच्छा से फोन पर किए गए विनोद को सहसा याद करते हुए अशुभ-सा लगा था कि क्या वे अपोलो में बैठकर चाँद पर लैण्डस्केप की तैयारी कर रहे हैं?

यों तो जन्मना इस्लामिक होने की वजह से उनका रिश्ता 'चाँद' से था, लेकिन 'धूप', उनके लिए सबसे प्यारी चज थी। सूरज उनके लिए सब कुछ था। कुछ दिन पहले ही उन्होंने फोन पर कहा था 'यार तू, देवास आ जा, मैंने 'कृष्ण' को लेकर एक सीरिज की है। राम से बड़े हैं कृष्ण। बचपन में जितना संघर्ष कृष्ण ने किया, उतना राम को कहाँ करना पड़ा।

'ये क्या कर रहे हैं, आप ?' मैंने कुरेदने के लिए कहा था, तो वे बोले थे- 'आडवाणी साहब को जवाब दे रहा हूँ, यार। धर्म दूसरा हो जाने से विरासतें थोड़ेई दूसरी हो जाती हैं। तू आकर देखना, काम में बहुत वजन है।'

उनकी नाक में ऑक्सीजन की नली लगी हुई थी और दूर टेबल पर एक बोतल में बुलबुले फूट रहे थे। सिरहाने कार्डियोग्राम था। वे देख नहीं पा रहे थे कि कार्डियोग्राम के पर्दे पर कितनी आड़ी-तिरछी रेखाएँ खिंचती जा रही थीं
बहरहाल, उनके द्वारा फोन पर मना करने के बावजूद, मैं वहाँ अस्पताल पहुँच गया था। उनके पास। वे लेटे हुए थे। पलंग पर। दूर देखते हुए। चुँधियाती आँख से खिड़की के बाहर। मैं ठिठककर कोने में रुक गया। और, चुपचाप उन्हें अकेले लेटे हुए देखता रहा।

वे, बोले कुछ नहीं थे। मैं अलबत्ता जरूर थोड़ा सहम गया था। कुछ देर बाद उन्होंने खिड़की के बाहर की धूप की तरफ़ से मुँह फेरकर मेरी तरफ किया और देखते ही बेसाख्ता बोले- 'अरे भैया, तू ऐसी धूप में इतनी दूर चल के क्यों आ गया?'

उनकी नाक में ऑक्सीजन की नली लगी हुई थी और दूर टेबल पर एक बोतल में बुलबुले फूट रहे थे। सिरहाने कार्डियोग्राम था। वे देख नहीं पा रहे थे कि कार्डियोग्राम के पर्दे पर कितनी आड़ी-तिरछी रेखाएँ खिंचती जा रही थीं। जैसे, वहाँ कार्डियोग्राम नहीं, बल्कि उसके भीतर बैठा हुआ कोई रेखाओं का खेल कर रहा हो।
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