मुख्य पृष्ठ  सामयिक  आलेख  विचार-मंथन
 
आँखें, जो मौत के बाद भी देख रही हैं दुनिया
जीवन में कुछ बातें ऐसी होती हैं, जिन्हें सुनकर-जानकर एकाएक तो यकीन नहीं होता और जब बातें आँखों के सामने साफ होती हैं, तो श्रद्धा और प्रेरणा से हमारी आँखें नम हो आती हैं, मस्तक झुक जाता है कि किसी व्यक्ति की अंतःप्रेरणा और दायित्वबोध इतने गहरे भी हो सकते हैं।

ऐसी ही एक घटना पिछले दिनों हुई जब गदरपुर निवासी संदीप चावला ने अपने 7 दिन के नवजात शिशु की आँखें दान कीं। अब वो आँखों किसी और की बेरंग जिंदगी में उजाला करेंगी। उन आँखों से कोई और जीवन के रंगों का साक्षात्कार करेगा। जिसे जाना था, वो तो चला ही गया, लेकिन उसकी आँखें अभी भी किसी और के बहाने दुनिया देख रही हैं।

एक वर्ष पूर्व संदीप चावला का विवाह हुआ था। उसके बाद विगत 4 मई को उनके घर में बरसों बाद खुशी का एक मौका आया। चावला दंपती की गोद में अर्जुन था, लेकिन तब कौन जानता था कि इस घर को खुशियों से भर देने वाला अर्जुन सिर्फ कुछ ही दिनों का मेहमान है।

जन्म के बाद बच्चे को साँस लेने में कुछ परेशानी हो रही थी। इसलिए उसे बरेली के अंतरराष्ट्रीय नवजात शिशु जाँच केंद्र में ले जाया गया। इलाज चल रहा था और अर्जुन की हालत सुधरती जान पड़ रही थी। माता-पिता को उम्मीद बँधी कि अब सब ठीक हो जाएगा।

डॉक्टरों की सलाह पर उसे कुछ दिन और अस्पताल में रखे जाने का निर्णय लिया। बच्चे के नामकरण की औपचारिकताएँ भी वहीं पूरी की गईं। परिवारजनों ने बड़े प्यार से उसका नाम अर्जुन रखा। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। जिस दिन अर्जुन का नामकरण किया गया था, उसी रात अचानक उसकी तबीयत फिर बहुत खराब हो गई। उसे साँस लेने में परेशानी हो रही थी।

किसी विशालकाय दैत्य की तरह मुँह बाए खड़ी रात बीतने को ही नहीं आ रही थी। वक्त गुजर रहा था। रात बीती, सुबह हुई, लेकिन सुबह का उजाला भी गम के अँधेरों में डूब गया। वो रात अर्जुन के जीवन की आखिरी रात थी। अर्जुन अगले दिन की रौशनी न देख सका। बरसों बाद घर में जला चिराग बुझ चुका था। रौशनी लुप्त हो चुकी थी।

लेकिन बात यहाँ खत्म नहीं होती। बात दरअसल यहीं से शुरू होती है। जिस पिता के हाथों में अपने बच्चे की लाश हो, आप उससे कैसे विवेक या संतुलन की अपेक्षा कर सकते हैं। लेकिन ऐसे मुश्किल क्षणों में भी संदीप चावला ने जिस विवेक और कर्तव्यबोध का परिचय दिया, वो हम सभी के लिए एक मिसाल है।

अर्जुन के मृत शरीर को अपने हाथों में लिए हुए उन्होंने तत्काल एक गंभीर निर्णय लिया, अपने बच्चे की आँखें दान करने का निर्णय। वक्त बहुत कम था, और बरेली में इसकी सुविधा उपलब्ध नहीं थी। चावला परिवार तत्काल बच्चे को लेकर रुद्रपुर के लिए रवाना हो गया।

डॉक्टर ने संदीप चावला को बच्चे की आँखों में हर 10 मिनट पर एक आई ड्रॉप डालने के लिए कहा था, ताकि आँखें मृत न होने पाएँ और बच्चे का कार्निया सूखे नहीं। वे बरेली से रुद्रपुर जा रहे थे। अर्जुन का मृत शरीर संदीप की गोद में था। उनकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे, लेकिन वे दवा डालना नहीं भूले।

रुद्रपुर में पंतनगर नेत्रदान केंद्र में अर्जुन की आँखों का ऑपरेशन हुआ। मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ. कल्याण सिंह, डॉ. इला सिंघल और डॉ. उदयशंकर ने अजुर्न का सफलतापूर्वक ऑपरेशन किया और तत्काल उसकी आँखें दिल्ली के वेणु नेत्र संस्थान भेज दी गईं। चावला परिवार भारी मन से गदरपुर लौट आया। अब घर में चहल-पहल और खुशी का माहौल नहीं था। घर में खुशियाँ लाने वाला तो बहुत दूर जा चुका था, लेकिन फिर भी मन में एक संतोष था, कि जाते-जाते भी उसका जीवन दूसरों के काम आ सका।

संदीप चावला का यह कदम एक प्रेरणा स्रोत है। यह बताता है, कि सुख और दुख दरअसल मनुष्य के हाथ में है। जीवन की बड़ी-से-बड़ी तकलीफ में भी सुख और सार्थकता की प्रेरणा छिपी होती है। आज अर्जुन इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उसकी आँखें हैं, जो संसार के हर रंग, हर खुशी के साथ एकाकार हो रही हैं। संदीप भी उन आँखों से दुनिया देख रहे हैं। अर्जुन की आँखें दुनिया देख रही हैं।
और भी
प्रारंभ और अंत के बीच
उन्हें अपने अंत का आभास था
हल की ओर सर क्रीक विवाद
इराक : दवा के साथ बढ़ता मर्ज
मुक्ति का नया मार्ग : कार्बन का व्यापार
शुभकामनाएँ उत्तरप्रदेश...!!!