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नासा रोबोटिक वाहन क्यूरियोसिटी को मंगल ग्रह पर उतारने की जोखिम भरी तैयारी कर रहा है। लैंडिंग पर अरबों डॉलर और वर्षों की मेहनत टिकी है। सात मिनट के भीतर हजारों किलोमीटर की रफ्तार पर ब्रेक लगाना है, वरना मिशन मर जाएगा।

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा मार्स साइंस लेबोरेट्री के यान को मंगल ग्रह के वायुमंडल के करीब पहुंचा चुका है। यान के भीतर क्यूरियोसिटी नाम की रोबोटिक गाड़ी है। यान की रफ्तार फिलहाल 13,000 मील (20,800 किमी) प्रति घंटा है। लैंडिंग के दौरान सात मिनट के भीतर 13,000 मील प्रति घंटा की गति को शून्य पर लाना होगा। अगर ऐसा हुआ तो मिशन के सफल होने की संभावनाएं बढ़ जाएंगी, नहीं तो वैज्ञानिक मायूस होंगे।

मार्स साइंस लेबोरेट्री इन सात मिनट को 'दहशत के सात मिनट' कह रही है। मिशन की सफलता या विफलता के लिए 'डेड और अलाइव' यानी मुर्दा या जिंदा की कमांड तय है। लैंडिंग पांच अगस्त की शाम को होगी। भारत में उस वक्त छह अगस्त की दोपहर होगी। सात मिनट की लैंडिंग कैसी रही इसकी जानकारी अगले सात मिनटों में मिलेगी। मंगल ग्रह से धरती तक सिग्नल आने में सात मिनट लगेंगे। लिहाजा लैंडिग की शुरुआत के 14 मिनट बाद तस्वीर साफ हो जाएगी।

नासा ने यूरोपीयन स्पेस एजेंसी (ईएसए) से भी संपर्क किया है। ईएसए से लैंडिंग की निगरानी करने और तस्वीरें जुटाने का आग्रह किया गया है। यह काम द मार्स एक्सप्रेस भी करेगा जो दिसंबर 2003 से मंगल की कक्षा में है।

कैसे होगी लैंडिंग : लैंडिंग के दौरान यान को जोखिम भरी कलाबाजियां खानी होंगी। यान पर लगा कंप्यूटर इन कलाबाजियों को नियंत्रित करेगा। मंगल का वायुमंडल रफ्तार कम करने में कुछ मदद करेगा। मंगल के वायुमंडल के घर्षण से यान की रफ्तार 1,000 मील कम होकर 12,000 मील प्रतिघंटा रह जाएगी। मंगल का वायुमंडल पृथ्वी के वायुमंडल की तुलना में 100 गुना कम सघन है। इसकी वजह से रफ्तार भी धीरे धीरे ही कम होगी।

इसके बाद यान का एक पैराशूट खुलेगा। 100 पाउंड वजनी पैराशूट 65,000 पाउंड का दबाव झेलेगा। यह यान की रफ्तार को काफी कम कर देगा। लेकिन इस दौरान यान बहुत गर्म हो जाएगा। रफ्तार 370 मील प्रति घंटा होते ही क्यूरियोसिटी का गर्म हो चुका बाहरी कवच उतरेगा। पैराशूट भी टूटेगा। ऐसा होते ही रिवर्स रॉकेट सुलगेंगे। रिवर्स रॉकेट यान की डगमगाहट को खत्म करेंगे और सधी हुई लैंडिंग के लिए गति को काबू करने लगेंगे।

रफ्तार के दो मील प्रतिघंटा यानी करीब 3.2 किलोमीटर प्रति घंटा होते ही एक कैप्सूल क्यूरियोसिटी को मंगल की सतह पर उतारेगी। सतह से 25 फुट ऊपर टिका यान स्काई क्रेन और उसके तारों के सहारे क्यूरियोसिटी को नीचे उतारेगा। यह पूरी प्रक्रिया सात मिनट के भीतर बिना किसी गलती के होनी चाहिए। सब ठीक रहा तो क्यूरियोसिटी के पहिए जूऊऊऊऊ...गर्रर की आवाज के साथ मंगल की सतह की वैज्ञानिक पड़ताल शुरू कर देंगे।

ईएसए के वैज्ञानिक मिचेल डेनिस उम्मीद जताते हुए कहते हैं, अगर क्यूरियोसिटी सफलता से उतरा 'तो यह डीलर से ली गई नई कार की तरह दिखेगा।'

क्यों खास है क्यूरियोसिटी : क्यूरियोसिटी का आकार एक स्पोर्ट्स कार जितना है। यह सात फुट चौड़ा, 10 फुट लंबा और 900 किलो वजनी है। क्यूरियोसिटी से पहले 1997 में सोजर्नर मंगल ग्रह पर पहुंचा। उसका वजन 10 किलो था। इसके बाद 2004 में 180 किलो वजनी स्पिरिट और ऑपरच्युनिटी नाम के रोवर (रोबोट) भी मंगल पर उतरे। लेकिन क्यूरियोसिटी इन सबसे बड़ा है।

इसकी सतह पर रेंगने की रफ्तार भी ज्यादा है। ऑपरच्युनिटी 0.1 मील प्रति घंटा की रफ्तार से रेंगता है, लेकिन नया रोबोट 3.35 मील प्रति घंटा की रफ्तार से मंगल की सैर करने में सक्षम है।

लेकिन मिशन के पहले चरण में रफ्तार मायने नहीं रखती। सबसे जरूरी है मशीन का मंगल पर सही सलामत उतरना और फिर काम करते रहना। ऑपरच्युनिटी अब तक मंगल पर 21.4 मील की यात्रा कर चुका है और अब भी महत्वपूर्ण जानकारियां भेज रहा है।

कैसी बुझेगी जिज्ञासा : क्यूरियोसिटी ऑपरच्युनिटी और स्पिरिट से कहीं बड़ा प्रोजेक्ट है। 2.5 अरब डॉलर खर्च कर चुकी नासा का यह सबसे महंगा मंगल मिशन है। हो सकता है कि खर्चा एक अरब डॉलर और बढ़े।

नासा चाहता है कि उसके रोवर मंगल ग्रह के बीचों बीच पहुंचें और वहां जीवन की संभवनाएं तलाशें। क्यूरियोसिटी में कई उपकरण लगे हैं। छह पहियों वाला रोवर लेजर किरणें फेंक कर चट्टानों के आकार को नाप सकता है। वह यह भी पता लगाने में सक्षम है कि चट्टानें किस तत्व की बनी हैं। यह हर चीज का एचडी वीडियो बनाकर धरती पर भेज सकता है। इतना ही नहीं रोवर की ड्रिल मशीनें मंगल की सतह को छेद कर नमूने लेंगी, नमूने रोवर के माइक्रोस्कोप में वहीं टेस्ट किए जाएंगे। 12.5 माइक्रोन जैसे अतिसूक्ष्म कण की भी यह तस्वीर ले लेगा।

लेकिन यह तभी होगा जब सात मिनट की लैंडिंग परफेक्ट रहेगी। नाकामी हाथ लगी तो यह नासा का मंगल पर आखिरी मिशन साबित हो सकता है। 1960 से अब तक अमेरिका, यूरोप, रूस और जापान मंगल पर 40 यान भेज चुके हैं। इनमें से आधे से ज्यादा या तो क्रैश हो गए या लापता हो गये।

रिपोर्ट: जॉन ब्लाऊ/ओंकार सिंह जनौटी
संपादन: अनवर जे अशरफ
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सौजन्य से - डॉयचे वेले, जर्मन रेडियो
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