शगुन चौधरी देश की सबसे प्रतिभाशाली महिला शूटरों में से एक हैं। असल में शगुन ‘ब्यूटी विद गन’ हैं। लंदन ओलिम्पिक के लिए क्वालिफाई करने वाली वह पहली महिला शूटर थीं। ओलिम्पिक में शूटिंग स्पर्धा में कड़ा मुकाबला होता है। लेकिन ट्रैप शूटर शगुन की नजर में ओलिम्पिक विश्व चैंपियनशिप से काफी आसान है।
जयपुर की इस शूटर ने बीबीसी के साथ बातचीत में कहा, 'यकीनी तौर पर ओलिम्पिक एक अहम स्पर्धा है। लेकिन मेरी नजर में ओलिम्पिक से ज्यादा मुश्किल विश्व चैम्पियनशिप होती। क्योंकि वर्ल्ड चैम्पियनशिप में 100 के करीब शूटर होते है। जबकि ओलिम्पिक में सभी देशों को मौका नहीं मिलता। ओलिम्पिक में कम शूटर होते हैं।
अच्छी तैयारी : हालांकि शगुन ने कहा कि उनकी ओलिम्पिक की तैयारी काफी अच्छी है और वह बेहतर परिणाम की उम्मीद कर रही हैं।
इस युवा ट्रैप शूटर ने कहा, 'मेरी तैयारी काफी अच्छी है। लेकिन मैं ओलिम्पिक को लेकर दबाव में नहीं हूं। मेरे लिए यह किसी अन्य टूर्नामेंट की तरह है। मेरी तैयारी बिलकुल वर्ल्ड चैम्पियनशिप जैसी हुई है।
शगुन ने बताया कि उन्होंने अपनी ट्रेनिंग में योगा का भी सहारा लिया है। इसके अलावा फिटनेस के लिए उनके जिम में काफी सत्र किए हैं। लेकिन ट्रेनिंग से अधिक उनके लिए लगातार यात्राएं एक बड़ी चुनौती है, नुकसान भी हैं
शगुन ने कहा कि भारतीय टीम में आने का सबसे बड़ा नुकसान घर से बाहर रहने का होता है। परिवार से मिलने का मौका नहीं मिलता क्योंकि काम्पिटीशन के लिए लगातार यात्रा करनी पड़ती है। एक सूटकेस हमेशा पैक करके रखना पड़ता है। एक समय के बाद घर की याद आने लगती है। कई बार लगता है कि एक-दो महीने कुछ न करें।
पिछले तीन साल के दौरान भारत में खेलों का माहौल है। शूटिंग सहित अन्य स्पर्धाओं के लिए विदेशों में कैम्प लग रहे है, इसलिए खिलाड़ियों को काफी यात्रा करनी पड़ रही है।
स्पोर्ट्स साइकोलॉजिस्ट अहम : शगुन ने कहा कि शूटिंग में स्पोर्ट्स साइकोलॉजिस्ट सबसे अहम होता है। वह शूटर को बताने में मदद करता है कि उसे खुद को कैसे संभालना है। कैसे उसे कॉम्पिटीशन में जाना है और कैसे टूर्नामेंट के दौरान अपने खेल को कैसे संभालना है। फोकस इधर से उधर न हो, स्पोट्र्स साइकोलॉजिस्ट की मौजूदगी इसका खतरा कम करती है।
शगुन ने बताया, 'शूटिंग में मजबूत एकाग्रता सबसे अहम पहलू है। अच्छी एकाग्रता का फायदा सामान्य जीवन में भी मिलता है क्योंकि आप अपने आसपास होने वाली छोटी-छोटी चीजों पर भी गौर करने लगते हैं।'
शगुन कहती हैं कि राजस्थान शाही परिवारों का शहर है। पुराने जमाने में राजपरिवारों की महिलाएं पुरुषों के साथ शिकार करने के लिए जाती थी। इसलिए महिलाओं को शूटिंग में देखकर हैरान होने का कोई कारण नहीं है। शगुन को भी यह खेल एक तरह से शाही परिवार से ही मिला
पिता से मिली शूटिंग : शगुन ने बताया कि मुझे यह खेल मेरे पिता से मिला। वह महाराजा कर्णी सिंह के साथ बीकानेर में शूटिंग करते थे। मैं दो साल की थी। मेरे पिता 12 बोर की राइफल से साथ निशानेबाजी करते थे। मैं अपने खिलौना गन से खेलती थी।
शगुन हाल के सालों में भारतीय खेलों में आए बदलाव से काफी खुश नजर आईं। उन्होंने बताया कि एक समय था कि खिलाड़ियों को गंभीरता से नहीं लिया जाता था। सभी को लगता था कि खिलाड़ी अपना शौक पूरा कर रहे हैं। लेकिन अब ऐसा नही है।
शगुन ने अपना एक अनुभव भी सुनाया कि एक बार वह एक पार्टी में थी। पार्टी में एक युवा ने शगुन से पूछा कि वह क्या करती हैं। शगुन का जवाब था कि वह भारतीय निशानेबाजी टीम की सदस्या हैं। युवक ने फिर दोहराया कि वह तो ठीक है लेकिन आखिर वह करती क्या हैं।