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बस्तर के जंगलों में एक आवाज सदियों से गूंजती चली आ रही है। यह आवाज इंसानों जैसी तो है, मगर इंसानों की नहीं है। इस आवाज का जिक्र सदियों से मध्य भारत के आदिवासियों की दंतकथाओं में होता आ रहा है। यह आवाज है एक प्यारी सी चिड़िया की, जिसे पहाड़ी मैना या बस्तर की मैना के नाम से जाना जाता है।

मैना की यह प्रजाति असम, अंडमान-निकोबार के अलावा दक्षिण भारत के केरल और मध्य भारत के उत्तरी आंध्र प्रदेश, ओडिशा के मलकानगिरी और छत्तीसगढ़ के बस्तर में पाई जाती है।

वन्य प्राणी विशेषज्ञ अरुण भरोस के अनुसार स्वभाव से बस्तर की मैना शर्मीली होती है और यह अपनी प्रजाति की दूसरी मैनाओं से इसलिए अलग है चूंकि वह नकल करने में उस्ताद है।

क्लिक करें सुनिए बस्तर से सलमान रावी की रिपोर्ट: वो कहते हैं कि इसकी सबसे खास बात यह है कि यह इंसानों की आवाज की नकल कर सकती है। यही इसे अपनी प्रजाति की दूसरी मैनाओं से अलग बनाता है। पहाड़ी मैना का रंग भी दूसरी मैनाओं से कुछ अलग है।

छत्तीसगढ़ में अब बस्तर की मैना विलुप्ति के कगार पर पहुंच गई है। हालांकि इसके संरक्षण के लिए छत्तीसगढ़ की सरकार नेकई उपाय किए हैं। सरकार ने पहले इसे अपना राज्य-पक्षी घोषित किया, फिर इसके संरक्षित प्रजनन के लिए जगदलपुर के वन विद्यालय में एक बड़ा पिंजरा बनवाकर उसमें मैना के चंद जोड़ों को रखा गया।

मगर कई सालों के बाद भी यह तय नहीं हो पाया कि इनमें से नर कौन है और मादा कौन। अरुण भरोस के अनुसार इस मैना की खासियत यह भी है कि इसके बारे में यह पता लगाना कि कौन सा नर है और कौन सी मादा बड़ा मुश्किल काम है।

वह कहते हैं कि सिर्फ इसके व्यवहार से ही इस बात का पता चल सकता है। हालांकि संरक्षित प्रजनन के लिए जगदलपुर के वन विद्यालय में रखी गई बस्तर की मैना के बारे में विशेषज्ञों को भी यह पता लगाना मुश्किल साबित हुआ है, लेकिन वन्य प्राणियों के विशेषज्ञों को लगता है कि अगर ठीक से इनके व्यवहार पर नजर रखी जाए तो यह पता लगाया जा सकता है। भरोस के अनुसार इसके लिए रात-दिन उन पर नजर रखनी होगी।

संरक्षित प्रजनन की असफलता के बाद छत्तीसगढ़ की सरकार ने अब तय किया है कि इन पक्षियों का ठिकाना बदल दिया जाए।

नया पिंजरा: अब कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान के प्राकृतिक परिवेश में इनके संरक्षित प्रजनन के लिए एक बड़ा सा नया पिंजरा बनाया जा रहा है। राज्य के वन मंत्री विक्रम उसेंडी को उम्मीद है कि स्थान के परिवर्तन से इनके संरक्षित प्रजनन में सफलता मिल सकती है।

उसेंडी के अनुसार चूंकि जगदलपुर का वन विद्यालय जहां स्थित है वह राष्ट्रीय राजमार्ग है और दिन-रात इस सड़क पर वाहनों का शोर रहता है। इतना ही नहीं, विद्यालय के ठीक पीछे रेलवे लाइन भी है जहां से मालगाड़ियों और यात्री ट्रेन का परिचालन होता है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि इस शोर-शराबे की वजह से उनके प्रजनन पर असर पड़ा है, इसलिए अब उनके रहने के स्थान को बदलना ही सही रहेगा। राज्य के वन विभाग ने बस्तर की मैना को संरक्षित करने के लिए अब विशेषज्ञों की मदद लेनी शुरू कर दी है।

कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान में जिस जगह इन जोड़ों को रखा जाना है उसे कई विशेषज्ञों ने देखा है। उनकी हरी झंडी के बाद ही अब यह फैसला लिया गया है कि इन पक्षियों को इनके प्राकृतिक परिवेश में ही रख कर संरक्षित प्रजनन का प्रयास किया जाए या नहीं। सरकार को उम्मीद है कि विशेषज्ञों की देख-रेख में बस्तर की मैना का संरक्षित प्रजनन अब संभव हो पाएगा।
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