विचार-मंथन
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आखिर वह कौन सी सोच है जिसके कारण दुनिया भर में महिलाओं के खिलाफ शोषण बढ़ता ही जा रहा है? लाख कानून बनाने और सिस्टम बदलने के बावजूद यह रुकने का नाम नहीं लेता। यदि बलात्कार की घटनाओं पर रोक लगानी है तो कानून नहीं, दकियानूसी सोच बदलनी होगी। यही सोच महिलाओं को पुरुष से कमतर बनाती है। आओ, जरा एक नजर उस सोच पर डालें...

* मध्ययुगीन या कट्टर धार्मिक सोच के लोग हमेशा कहते आए हैं कि आखिर लड़की ऐसे कपड़े क्यों पहनती है जिससे पुरुष बलात्कार के लिए प्रेरित हो।

* दुनिया का हर धर्म और समाज यही कहता है कि स्त्री को हमेशा मर्यादा और पर्दे में रहना चाहिए।

* दुनिया के सभी धर्म शास्त्रों में लिखा है- स्त्री को पिता या पति की इच्छा के बगैर कोई कदम नहीं उठाना चाहिए। याने स्त्री निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र नहीं है।

* ईसाई, यहूदी और इस्लाम धर्म मानता है कि पुरुष की बाईं पसली से स्त्री की उत्पत्ति हुई है। ऐसे में हर मामले में पुरुष का दर्जा महिलाओं से ज्यादा है। महिलाएं उनके अधीन ही रह सकती हैं।

* हिंदू धर्म ने भी स्त्री को दूसरे दर्जे का खिताब दिया है। स्त्री संतान उत्पति में सक्षम न हो तो उसे आठवें वर्ष में, संतान होकर मर जाए तो दसवें वर्ष में तथा कन्या ही कन्या पैदा करे तो ग्यारहवें वर्ष में तथा अप्रिय बोलने वाली को तत्काल छोड़ देना चाहिए। -मनुस्मृति।

* बचपन से बताया जाता है स्त्री को कि यह तुम्हारा मायका है असली घर तो तुम्हारे पति का घर है। तुम्हें मर्यादा में रहना है, पति को पूजना है, सास और ससुर की सेवा करनी है।

अभी कुछ बयानवीरों ने बयान दिए हैं-

* स्त्री को पुरुष मित्र नहीं बनाना चाहिए।
* स्त्री को 6 बजे बाद घर से नहीं निकलना चाहिए।
* स्त्री को पुरुषों की बराबरी नहीं करनी चाहिए। शक्ति और बुद्धि के मामले में पुरुष स्त्री से आगे है।
* बलात्कार तो होते रहते हैं कोई नई बात नहीं है। स्त्री को खुद अपनी सुरक्षा करनी चाहिए।
* समर्पण कर देती तो कम से कम आंतड़ियां तो बची रहती।
* एक लड़की के बलात्कार को इतना तूल क्यों दिया जा रहा है।
* रात में लड़कियां डिस्को करती है और दिन में केंडल मार्च।

जब से स्त्री ने स्वतंत्रता की हवा में सांस लेना शुरू किया है तब से धर्म, समाज और राष्ट्र की आचार संहिताओं की चुनौतियां बढ़ गई हैं। तब स्वाभाविक ही है कि स्त्री पर फिर से बंदिशें लगाने के लिए तथाकथित धर्म के ठेकेदार कहीं हथियार उठाएंगे तो कहीं बयानों से माहौल को गंदा और दंगा करेंगे।

जब से धर्म का आविष्कार हुआ है, महिलाओं की आत्मा को लगभग मार दिया गया है। धर्म और राजनीति के मध्ययुगीन विचार आज धीरे-धीरे पुन: हावी होते जा रहे हैं। धर्म के नाम पर स्त्री के जीवन को पुन: घर में ही समेट देने की कवायद तो इस्लामिक मुल्कों में चल रही है, लेकिन सभ्य कहे जाने वाले मुल्कों में भी तालिबानी सोच का जोर है। दूसरी ओर बाजारवादी सोच के चलते स्त्री की सुंदर देह का भरपूर उपयोग किया जा रहा है।

सवाल उठता है कि क्या सिस्टम बदल देने या कड़े कानून बना देने से यह बर्बर सोच बदल जाएगी?

तब सवाल यह भी उठता है कि क्या धर्म पैदा करता है ऐसी मानसिकता जिससे कि स्त्री दूसरे दर्जे की बनती है। जिससे की स्त्री को संपत्ति माना जाता है और जिसने स्त्री को सामूहिक उपभोग की वस्तु भी बना दिया है। जर, जमीन के साथ क्यों स्त्री को जोड़ा जाता है?

जो विचारधारा (धर्म और साम्यवाद) व्यक्ति स्वतंत्रता के खिलाफ है और जो यह सोचती है कि स्त्री और पूंजी का समान वितरण हो तथा स्त्री को पुरुष अधीनता स्वीकार करनी चाहिए, ऐसी विचारधारा से आप कैसे समानता या बराबरी की आशा कर सकते हैं?
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