विचार-मंथन
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Damini is no more
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नहीं रही दामिनी। एक कली मुरझा गई। एक बूंद ओस की, सूख गई तपन से। झुलस गई अगन से। किसी का कुछ नहीं गया। बस एक लाड़ली बिछड़ गई अपने अपनों से। सारा देश जिसके लिए दम साधे कर रहा था प्रार्थना, बीती रात उसने अंतिम सांस ली। लेकिन दामिनी की शहादत को नमन और यह संकल्प कि उसकी यह कुर्बानी व्यर्थ नहीं जाएगी।

दामिनी का दर्द और सरकार की शर्म

दामिनी का जाना जितना दर्दनाक है उससे भी अधिक सरकार की हरकतें शर्मनाक है। मात्र पांच लोग(सोनिया, प्रणव, राहुल, मनमोहन और शीला) इस देश में इतने महत्वपूर्ण हो गए कि उनकी सुरक्षा के लिए पूरी दिल्ली को छावनी बना दिया जबकि एक लड़की जो इस देश की नागरिक है, (जिसके वोटों से चुन कर सरकार सत्ता पर काबिज होती है, इतनी मदोन्मत्त होती है) उसकी सुरक्षा का यह आलम कि वह रात 10 बजे कहीं आ-जा नहीं सकती और जब दरिंदे, हैवान और वहशी किस्म के लोग उसकी जिंदगी को तार-तार कर दे तो सरकार के पास मुंह छुपाने के लिए कपड़ा भी ना बचे।

यह सरकार हमारी क्या सुरक्षा करेगी

सारी सरकार नग्न खड़ी है इस वक्त। इस पूरे प्रकरण में जिस तरह की मूर्खता सरकार ने दिखाई है वह निहायत ही धिक्कार के योग्य है। इंडिया गेट पर जो बच्चे जमा हुए थे वे निहत्थे थे और दिल्ली की जनसंख्या के मान से बहुत कम ही थे लेकिन उनसे निपटने में सरकार की तैयारी अगर इतनी लचर है तो जरा सोचिए कि अगर देश का आक्रोश हथियारबंद जनता के रूप में सामने आ जाए तो यह सरकार हमारी क्या सुरक्षा करेगी? जो सरकार एक लड़की की सुरक्षा को लेकर इतनी बदहवास हो सकती है उसे नैतिक रूप से सत्ता में बने रहने का कोई हक नहीं है। क्या यह पांच अब भी अपनी नाकामी को लेकर शर्मिंदा हैं??

क्या अपराध था उसका

दामिनी चली गई लेकिन ठंड की तीख‍ी बयारों में तैर रहे हैं उसके पैने सवाल। आखिर क्या अपराध था उसका, लड़की होना, इस देश में जन्म लेना, देश की आजाद हवा में सांस लेना,अपनी आबरू की सुरक्षा को लेकर अंतिम समय तक जुझना, अपने करियर के उजले सपने लेकर इस काली राजधानी में आना? क्या अपराध था उसका, उसकी देह का, उसके कोमल मन का?

यह कैसी आजादी है? हमने ऐसी आजादी तो कभी नहीं चाही थी। जहां हमारे अपने ही लोग हमारी अपनी बेटियों को यूं कुचलते रहे, मसलते रहे और हम बेबस होकर व्यथित होते रहे... दामिनी के सवाल अगर आपकी बेटी के भी सवाल है तो संकल्प कीजिए नारी सम्मान का, स्नेह का और सुरक्षा का...

उसके र आंसू की कसम है हमें

अपनी मां की कोख में 9 माह रहकर जब नन्ही सी काया इस धरा पर आई होगी तो कितने ख्वाब माता-पिता की आंखों में सजे होंगे, कितनी बार उसकी खिलखिलाती हंसी से आंगन का कोना-कोना खिल उठा होगा..... लेकिन आज सब खामोश है. ..

और दामिनी के ही घर में नहीं आज हर उस घर में स्तब्धता है, नीरव सन्नाटा है जहां लाड़लियां रहती हैं। हर मां अपनी बेटी के लिए ऐसी कल्पना से सिहर उठी है, हर पिता के होंठों से बुदबुदाते हुए प्रार्थना फूल झर रहे हैं, हर दादी का की आंखें नम है और दादा के कलेजे पर कड़वा वजन है और हर भाई अपनी बहन को लेकर मन ही मन परेशान है। अगर यह किंचित भी सच है तो दामिनी का बलिदान बर्बाद ना होने पाए... उसके एक-एक आंसू की कसम है हमें...हमें यह नीच अपराध जिसे बलात्कार कहते हैं भारतीय समाज की डिक्शनरी से मिटाना होगा....
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