उत्सव का प्रारंभ तभी होता है, जब कण्णकी चरित के आलापन के साथ देवी को कंकण पहनाकर बैठा दिया जाता है। उत्सव के नौ दिनों के बीच में वह सारा चरितगान पूरा का पूरा आलापित हो जाता है। यानी कोटुंगल्लूर देवी की आवभगत कर आट्टुकाल मंदिर में आनीत किया जाता है। सारी घटनाओं के बाद पाण्ड्य राजा का वध तक है चरितगान।
पाण्ड्य राजा के निग्रह के पश्चात विजयाघोष एवं हर्षोल्लास चलता है। साथ ही पोंकल के चूल्हों में आग लगाई जाती है। फिर शाम को निश्चित समय पर पुजारी पोंकल पात्रों में जब तीर्थजल छिड़कते हैं, तब विमान से पुष्पवर्षा होती है। देवी की नैवेद्य-स्वीकृति से प्रसन्न होकर नैवेद्यशिष्ट सिर पर धारण करके स्त्रियाँ वापस जाने लगती हैं।
कैसे पहुँचें-
तिरुवनंतपुरम सेंट्रल रेलवे स्टेशन से यह पीठ मात्र दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। जबकि यहाँ के हवाई अड्डे से इसकी दूरी मात्र सात किलोमीटर ही है। भारत के सभी प्रदेशों से तिरुवनंतपुरम पहुँचने के लिए अनेक सुगम रास्ते हैं। तिरुवनंतपुरम पहुँचने वाले तीर्थ यात्री रेलवे स्टेशन अथवा बस अड्डे से सीधे आट्टुकाल पहुँच सकते हैं। उन यात्रियों की सुविधा के लिए बसों, टैक्सियों तथा ऑटो रिक्शाओं की पंक्तियाँ हमेशा सड़क के किनारों पर तैयार खड़ी रहती हैं। श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर के सामने से दो किलोमीटर दक्षिण-पूर्व की ओर पैदल चलें, तो तीस मिनट के अंदर आट्टुकाल देवी के सम्मुख पहुँच जाएँगे।
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