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शक्ति की देवी तुलजा भवानी
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तुलजा भवानी की स्वयंभू प्रतिमा-
शालीग्राम पत्थर से निर्मित यह मूर्ति वस्तुतः स्वयंभू मूर्ति मानी जाती है। इस मूर्ति के आठ हाथ हैं, जिनमें से एक हाथ से उन्होंने दैत्य के बाल पकड़े हैं तथा दूसरे हाथों से वे दैत्य पर त्रिशूल से वार कर रही हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि माता महिषासुर राक्षस का वध कर रही हैं। माता की दाहिनी ओर उनका वाहन सिंह स्थापित है। इस प्रतिमा के समीप ऋषि मार्कंडेय की प्रतिमा स्थापित है, जो पुराण पढ़ने की मुद्रा में है। माता के आठों हाथों में चक्र, गदा, त्रिशूल, अंकुश, धनुष व पाश आदि शस्त्र सुसज्जित हैं।

प्रतिमा का इतिहास
इतिहास में इस प्रतिमा का वर्णन मार्कंडेय पुराण के ‘दुर्गा सप्तशत’ नामक
अध्याय में उल्लिखित है। इस ग्रंथ की रचना स्वयं संत मार्कंडेय ने की थी। इस अध्याय में कर्म, भक्ति व ध्यान के संदर्भ में ज्ञान है। इस प्रतिमा की ऐतिहासिकता का दूसरा स्रोत भगवद्‍ गीता भी है।

तुलजा भवानी की कथा
कृतयुग में करदम नामक एक ब्राह्मण साधु थे, जिनकी अनुभूति नामक अत्यंत सुंदर व सुशील पत्नी थी। जब करदम की मृत्यु हुई तब अनुभूति ने सती होने का प्रण किया, पर गर्भवती होने के कारण उन्हें यह विचार त्यागना पड़ा तथा मंदाकिनी नदी के किनारे तपस्या प्रारंभ कर दी। इस दौरान कूकर नामक राजा अनुभूति को ध्यान मग्न देखकर उनकी सुंदरता पर आसक्त हो गया तथा अनुभूति के साथ दुष्कर्म करने का प्रयास किया। इस दौरान अनुभूति ने माता से याचना की और माँ अवतरित हुईं। माँ के साथ युद्ध के दौरान कूकर एक महिष रूपी राक्षस में परिवर्तित हो गया और महिषासुर कहलाया। माँ ने महिषासुर का वध किया और यह पर्व ‘विजयादशम’ कहलाया। इसलिए माँ को ‘त्वरित’ नाम से भी जाना जाता है, जिसे मराठी में तुलजा भी कहते हैं।

तुलजा भवानी की पूजा
इस मंदिर की ख्याति मराठा राज्य में फैली और यह देली भोसले प्रशासकों की कुलदेवी के रूप में पूजी जाने लगीं। छत्रपति शिवाजी अपने प्रत्येक युद्ध के पहले माता से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए यहाँ आते थे।

विश्रामशाला
यहाँ पर तीर्थयात्रियों के लिए विश्राम की व्यवस्था मंदिर की प्रबंधन समिति के हाथों में है। मंदिर की अपनी धर्मशाला है, जो यात्रियों के लिए निःशुल्क है। परिसर के बाहर भी कई निजी होटल व धर्मशालाएँ हैं।

कैसे पहुँचें?
तुलजापुर तक आने के लिए सभी प्रकार के यातायात के साधन उपलब्ध हैं। दक्षिण से आने वाले यात्री नालदुर्ग तक आसानी से सड़क मार्ग द्वारा आ सकते हैं। उत्तरी व पश्चिमी राज्यों से आने वाले तीर्थयात्री सोलापुर के रास्ते तुलजापुर तक आ सकते हैं। जबकि पूर्वी राज्यों से आने वाले यात्री नागपुर या लातूर के रास्ते यहाँ आ सकते हैं।
रेलमार्ग- तीर्थयात्री सोलापुर तक रेल से आ सकते हैं जो कि तुलजापुर से केवल 44 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
वायुमार्ग- तुलजापुर तक आने के लिए यहाँ से सबसे करीबी हवाई अड्डा पुणे व हैदराबाद हैं, जहाँ से बस या निजी वाहन द्वारा इस स्थान तक पहुँचा जा सकता है।
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