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सुनहरी आभा लिए अमृतसर का स्वर्ण मंदिर
जहाँ के सरोवर में भरा है अमृत
सुधीर कुमार
सुधीर कुमा/ हरकिशन शर्मा
प्रकाशपर्व के शुभ अवसर पर वेबदुनिया परिवार अपने सभी पाठकों को हार्दिक शुभकामनाएँ प्रेषित करता है। इस शुभ अवसर पर हम आपके लिए लाए हैं अमृतसर का स्वर्ण मंदिर। अमृतसर... एक शहर का नाम, जिसकी पहचान है वहाँ के स्वर्ण मंदिर से। सुनहरी आभा लिए इस मंदिर को सिखों के सबसे पवित्र गुरुद्वारे का दर्जा दिया गया है। माना जाता है कि 16वीं शताब्दी में सिखोके चौथे गुरु रामदास ने एक तालाब के किनारे डेरा डाला, जिसके पानी में अद्‍भुत शक्ति थी। इसी कारण इस शहर का नाम अमृत+सर (अमृत का सरोवर) पड़ा

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सिख संप्रदाय को मानने वाला हर व्यक्ति चाहे वह दुनिया के किसी भी कोने में क्यों न रहता हो, अपनी जिंदगी में एक बार दरबार साहेब में मत्था टेकने की इच्छा जरूर रखता है।
गुरु रामदास ने तालाब के मध्य एमंदिर का निर्माण कराया, जो आज स्वर्ण मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। इस शहर मेअप्रैल माह में बैसाखी का पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। इसी दिन गुरु गोविंदसिंने सिखों को योद्धा कौम में परिवर्तित करते हुए खालसा पंथ की स्थापना कथी।

सरोवर को अमृत का दर्जा देने के पीछे भी एक रोचक कथा है। मान्यता है कि एक राजकुमारी जो अपने पिता से ज्यादा भगवान को महत्व देती थी। उसे पिता के क्रोध का सामना करना पड़ा। पिता ने उसकी शादी एक कोढ़ी से करवा दी। रामदास की भक्त यह राजकुमारी उनकी सेवा करने के लिए इस सरोवर के पास आई। इस बेरी के पेड़ के नीचे भरे पानी में स्नान करने के बाद उसका पति कोढ़मुक्त हो गया। राजकुमारी ने जब यह बात गुरु रामदास को बताई तो गुरूदेव ने प्रसन्नता से कहा- यही वह जगह है, जिसे मैं तलाश रहा था। यहीं हरमिंदर साहब की स्थापना की जाएगी। यही कारण है कि अमृतसर का नाम अमृतसर पड़ा ।
- दुखभंजनी बेरी

ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार सिखों के चौथे गुरु रामदास साहेब के मन में यह विचार आया था कि अरदास के लिए एक ऐसा गुरुद्वारा बनाया जाए, जिसकी स्थिति शहर के केंद्र में हो और जहाँ तक हर व्यक्ति आसानी से पहुँच सके। उनके इस सपने को मूर्त रूप देने का काम किया पाँचवें गुरु श्री अर्जुन साहेब ने। उनके इस सपने को मूर्त रूप देने में बाबा बुड्‍ढाजी ने उनकी सहायता की। स्वर्ण मंदिर का निर्माण 1570 ईस्वी में शुरू हुआ और 1577 तक यह मूर्त रूप में आया। वैसे यह मंदिर धार्मिक सौहार्द की भी जीती-जागती मिसाल है। इस मंदिर की नींव मुस्लिम संत हजरत मियाँ मीर ने खोदी थी। मंदिर के चार दरवाजे भी यहाँ की एकता और हर धर्म के प्रति समभाव की भावना को ही प्रकट करते हैं।

स्वर्ण मंदिर सिखों का सर्वाधिमहत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। इसे हरि मंदिर भी कहते हैं। इसके गुम्बद पर शुद्स्वर्ण पत्तियों का आवरण है, जो धरती की ओर झुकी हुई हैं। इसका आशय यह है कि सिदुनिया की समस्याओं के प्रति एक जागरूक कौम है। हरमिंदर साहब का गुरुद्वारा सरोवर के बीचोबीच बेहद खूबसूरती से बनाया गया है।

यहाँ हर समय गुरुवाणी का गायन किया जाता है। यहाँ अरदास कर चुके लोगों का मानना है कि हरमिंदर साहब में आकर उन्हें अलौकिक शांति मिली है, जिसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। इसे तो सिर्फ महसूस किया जा सकता है, इसलिए हर व्यक्ति को जीवन में एक बार वहाँ मत्था टेकने जरूर जाना चाहिए।
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