कहते हैं यहाँ पर इंद्र देव भी भ्रमण करने आते हैं, इसलिए इस पर्वत का नाम इंद्रकीलाद्री पड़ गया। यहाँ की एक और खास बात यह भी है कि सामान्यत: देवता के बाएँ स्थान पर देवियों को स्थापित करने के रिवाज को तोड़ते हुए यहाँ पर मलेश्वर देव की दायीं दिशा में माता स्थापित हैं। इससे पता चलता है कि इस पर्वत पर शक्ति की अधिक महत्ता है।
| यहाँ पर आने वाले तीर्थयात्रियों की संख्या दिनोदिन बढ़ती जा रही है, जिससे यहाँ पर सालाना चालीस करोड़ से भी अधिक का चढ़ावा चढ़ाया जाता है। सात शिवलीला और शक्ति महिमाओं में भी इस मंदिर का विशेष स्थान है। |
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यहाँ पर देवी कनकदुर्गा को विशेष रूप से बालत्रिपुरा सुंदरी, गायत्री, अन्नपूर्णा, महालक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा देवी, महिसासुरमर्दिनी और राजराजेश्वरी देवी के रूप में नवरात्रि में सजाया जाता है। विजयदशमी के अवसर पर देवियों को हंस के आकार की नावों पर स्थापित करके कृष्णा नदी का भ्रमण करवाया जाता है, जो ‘थेप्पोत्सवम’ के नाम से प्रचलित है। नौ दिनों तक चलने वाले नवरात्रि के समापन और दशहरा के अवसर पर इस दिन आयुध पूजा का आयोजन किया जाता है।
कैसे पहुँचें? विजयवाड़ा के केंद्र में स्थापित यह मंदिर रोलवे स्टेशन से दस किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। विजयवाड़ा हैदराबाद से 275 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह स्थान रेल, सड़क और वायु तीनों मार्गों से देश के सभी भागों से जुड़ा हुआ है।
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