शिव-शंभु के भक्तों को हम इस बार धर्मयात्रा में दर्शन करा रहे हैं श्री अरुणाचलेश्वर मंदिर के। यह सदियों पुराना मंदिर एक विशालकाय पर्वत पर स्थापित है, जो तिरुअन्नामलाई नामक कस्बे में स्थित है। लाखों श्रद्धालु यहाँ पर मुक्ति पाने के लिए विशेष अवसरों पर एकत्रित होते हैं।
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पूर्णमासी के समय दो से तीन लाख की तादाद में श्रद्धालु चौदह किलोमीटर तक नंगे पाँव चलकर पवित्र पर्वत- गिरि प्रथकशणम की परिक्रमा लगाते हैं और साल में एक बार दस से पंद्रह लाख श्रद्धालु इस पर्वत पर कार्तिगई दीपम (दिव्य ज्योति) प्रज्ज्वलित करते हैं। माना जाता है कि हिंदू धर्म में धूमधाम से मनाए जाने वाले शिवरात्रि त्योहार की शुरुआत भी इसी जगह से हुई थी।
| श्री अरुणाचलेश्वर मंदिर जिसे तमिल भाषा में तिरुअन्नामलय्यर नाम से भी जाना जाता है, एक पर्वत पर स्थित है। माना जाता है कि 2665 फुट ऊँचा यह पर्वत साक्षात शिव-शंभु ही हैं। |
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श्री अरुणाचलेश्वर मंदिर भगवान शिव के पंचभूत क्षेत्रों में से एक है। इसे अग्नि क्षेत्रम के रूप में भी सम्मान दिया जाता है (जबकि काँची और तिरुवरुवर को पृथ्वी, चिदंबरम को आकाश, श्री कलष्टी को वायु और तिरुवनिका को जल क्षेत्र माना जाता है)।
शिवपुराणम के अनुसार भगवान विष्णु और ब्रह्मा को अपनी शक्ति का परिचय करवाने के लिए इस स्थान पर प्रभु शिव ने अखंड ज्योति स्थापित की थी। यह कथा कुछ इस प्रकार है - एक बार प्रभु विष्णु और ब्रह्मा में अपनी श्रेष्ठता को लेकर विवाद उठ गया। वे भगवान शिव के पास पहुँचे और उनसे इस तथ्य की पुष्टि चाही। शिव ने उनकी परीक्षा लेने का निर्णय किया। उन्होंने इस स्थान पर अखंड ज्योति स्थापित करके इन दोनों के समक्ष यह शर्त रखी कि जो व्यक्ति पहले उनका आदि या अंत खोज लेगा, वही अधिक श्रेष्ठ होगा।
भगवान विष्णु ने वराह अवतार का रूप धरने के बाद भूमि खोदकर शिव का अंत (पाँव का अँगूठा) खोजने का अथक प्रयास किया। वहीं भगवान ब्रह्मा हंस रूप में उनका आदि स्वरूप (शीश) खोजने के लिए आकाश में उड़ चले। दोनों ने कठोर प्रयास किया, परंतु दोनों ही शिव का आदि और अंत खोजने में असफल रहे।
अंत में भगवान विष्णु अपनी हार मानते हुए वापस लौट आए। दूसरी ओर ब्रह्मा जब ढूँढते हुए थक गए तो उन्हें आकाश से पृथ्वी पर गिरता एक पुष्प मिला। पुष्प से पूछने पर उन्हें पता चला कि वह पुष्प भगवान शिव के बालों से कई युगों पहले गिरा था। ब्रह्मा को एक तरकीब आई और उन्होंने पुष्प से प्रार्थना की कि वह प्रभु शिव से झूठ बोले कि ब्रह्मा ने उनका आदि अर्थात शीश देख लिया है।
झूठ सुनकर शिव क्रोधित हुए और उन्होंने स्वर्ग से धरती तक अग्नि स्तंभ स्थापित कर दिया। इस स्तंभ की भीषण गर्मी से स्वर्ग और धरती पर निवास करने वाले सभी प्राणी घबरा गए। इंद्र, यम, अग्न, कुबेर और आठों दिशाओं के पालक प्रभु शिव के चरणों में गिर पड़े और उनसे अपना क्रोध शांत करने की प्रार्थना की। शिव उनके निवेदन से पिघल गए और स्वयं को अखंड ज्योति के रूप में समेट लिया। इस घटना के बाद से यहाँ महाशिवरात्रि का त्योहार मनाया जाने लगा।
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