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गुरु अरजनदेवजी: सर्वधर्म के पैरोकार
वाहे गुरुजी का खालसा, वाहे गुरुजी की फतेह
- प्रीतमसिंह छाबड़ा

गुरु अरजन देव साहिब शहीदी पर्व
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शिरोमणि शहीद, सर्वधर्म समभाव के प्रखर पैरोकार श्री गुरु अरजनदेवजी धार्मिक गुरु मात्र न होकर मानवीय आदर्शों को कायम रखने के लिए आत्मबलिदान करने वाली एक महान आत्मा थे। उनका जन्म 15 अप्रैल 1563 को सिख धर्म के चौथे गुरु, गुरु रामदासजी व माता भानीजी के घर गोइंदवाल (अमृतसर) में हुआ। गुरु अरजनदेवजी की निर्मल प्रवृत्ति, सहृदयता, कर्तव्यनिष्ठता तथा धार्मिक एवं मानवीय मूल्यों के प्रति समर्पण भावना को देखते हुए गुरु रामदासजी ने 1581 में पाँचवें गुरु के रूप में उन्हें गुरु गद्दी पर शुभोभित किया।

गुरुजी का मात्र 43 वर्ष का जीवनकाल अत्यंत प्रेरणादायी रहा। वे महान आध्यात्मिक चिंतक एवं उपदेशक होने के साथ ही अन्याय के विरुद्ध जूझने वाले समाज सुधारक भी थे। गुरुजी ने धर्म के नाम पर आडंबरों और अंधविश्वास पर क़ड़ा प्रहार किया। सती प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ जनचेतना कायम की।

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गुरुजी की मानव जाति को सबसे ब़ड़ी देन है गुरुग्रंथ साहिब का संपादन। क्योंकि उस समय एक ऐसे धार्मिक ग्रंथ की जरूरत थी, जो संपूर्ण मानवता में धार्मिक सौहार्द पैदा कर सके। गुरुजी ने इस उद्देश्य से पूर्ववर्ती गुरुओं की वाणी को जगह-जगह से एकत्र किया। उनको राग के अनुसार बाँटकर परिष्कृत किया।

इस "साँझे धर्मग्रंथ" में कबीरदास, रविदास, सघना, घन्ना, नामदेव, फरीद, त्रिलोचन सेन मरदान, परमानंद, जैदेव, पीपाजी व अन्य भक्तों की वाणी भी शामिल है। सन्‌ 1604 में सर्व साँझे ग्रंथ साहिब को हरिमंदिर साहिब अमृतसर में स्थापित करके बाबा बुड्ढाजी को पहला ग्रंथी नियुक्त किया। गुरुजी ने स्वयं की उच्चारित 30 रागों में 2,218 शबदों को भी श्री गुरुग्रंथ साहिब में दर्ज किया।

गुरुजी के कार्यों से भयभीत कुछ विघ्नसंतोषी लोगों ने तत्कालीन बादशाह अकबर से शिकायत की कि गुरुजी ने धर्मग्रंथ में अवतारों और पैगम्बरों की निंदा की है। बादशाह ने जब स्वयं गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ सुना तो उन्होंने श्रद्धाभक्ति से सोने की 51 मोहरें भी भेंट की। अकबर की मृत्यु के पश्चात गद्दी पर बैठे जहाँगीर ने खुसरो को देशद्रोही करार दिया। खुसरो जब गुरुजी से मिले तो उन्होंने खुसरो को आशीर्वाद दिया। इस पर जहाँगीर ने गुरुजी को दोषी ठहराते हुए लाहौर बुलवाया। उन पर अनेक झूठे आरोप लगाए गए।

बादशाह ने यासा कानून के तहत गुरु अरजनदेवजी को गर्म देग में उबालकर, गर्म तवे पर बैठाकर, शरीर पर गर्म रेत डालकर शहीद करने का हुक्म दे दिया। गुरुजी ने शारीरिक कष्ट में भी "तेरा कीया मीठा लागे/ हरि नाम पदार्थ नानक माँगे" शबद का उच्चारण करते हुए सन्‌ 1606 में अमर शहीदी प्राप्त की।
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