चमकौर साहब की गढ़ी के इस भयानक युद्ध में गुरुजी के दो बड़े साहबजादों ने शहादतें प्राप्त कीं। साहबजादा अजीतसिंह को 17 वर्ष एवं साहबजादा जुझारसिंह को 14 वर्ष की आयु में गुरुजी ने अपने हाथों से शस्त्र सजाकर मृत्यु का वरण करने के लिए धर्मयुद्ध भूमि में भेजा था।
सरसा नदी पर बिछुड़े माता गुजरीजी एवं छोटे साहिबजादे जोरावरसिंहजी 7 वर्ष एवं साहबजादा फतहसिंहजी 5 वर्ष की आयु में गिरफ्तार कर लिए गए।
उन्हें सरहंद के नवाब वजीर खाँ के समक्ष पेश कर ठंडे बुर्ज में कैद कर दिया गया और फिर कई दिन तक नवाब, काजी तथा अन्य अहलकार उन्हें अदालत में बुलाकर धर्म परिवर्तन के लिए कई प्रकार के लालच एवं धमकियाँ देते रहे।
दोनों साहबजादे गरजकर जवाब देते, 'हमारी लड़ाई अन्याय, अधर्म एवं जोर-जुल्म तथा जबर्दस्ती के खिलाफ है। हम तुम्हारे इस जुल्म के खिलाफ प्राण दे देंगे लेकिन झुकेंगे नहीं।' अततः 26 दिसंबर 1704 को वजीर खाँ ने उन्हें जिंदा चुनवा दिया।
साहिबजादों की शहीदी के पश्चात बड़े धैर्य के साथ ईश्वर का शुक्राना करते हुए माता गुजरीजी ने अरदास की एवं 26 दिसंबर 1704 को प्राण त्याग दिए।
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