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अलौकिक कृति 'जपुजी'
'मति विचि रत्न जवाहर माणिक' में मनुष्य के गुण आदि को रत्न, जवाहर तथा मोती कहा है। 'असंख सूर मुह भरव सार' कहकर आत्मिक योद्धा की विवशता का दर्शन दिया है जो धर्म क्षेत्र में कुरीतियों का सामना करते हुए उनके वार को झेलता रहता है। 'संतोख थापि रखिया जिनि सूति' कहकर संसार के नियमबद्ध होने का भेद समझा दिया है। जैसे- सूत्र में सब मनके पिरोये रहते हैं, इसी तरह संतोख नियम रूपी धागे में सारा जगत पिरोया हुआ है। बीसवीं पौमें बुद्धि की शुद्धता के लिए बहुत अलंकृत वाणी में मन को सृष्टि के दर्शन को समझाया गया है।

गुरुनानकजी लोकगुरु थे। इसीलिए उन्होंने ईश्वरीय संदेश को जन-जन तक पहुँचाने के लिए जपुजी में लोकभाषा का ही सर्वाधिक उपयोग किया। 'जपुजी' की भाषा उस समय की संतभाषा कही जा सकती है, जिसमें ब्रज भाषा का मिश्रण है। जपुजी के रचनाकाल में संस्कृत के शब्दों को पंजाबी या तद्भव रूप में लिखा जाता था।

जपुजी में कुछ शब्द अरबी-फारसी के तत्सम रूप में भी हैं। जैसे-पीर, परो, दरबार, कुदरत, हुक्मादि। अधिकतर तद्भव रूप ही लिए गए हैं, जैसे हदूरी (हजूरी), नंदरी (नजरी), कागद (कागज) आदि। इसके अतिरिक्त योगियों की विशेष प्रकार की शब्दावली पंजाबी रूप में पौ28 और 29 में मिलती है। 'जपुजी' गुरुवाणी में है जो कि गुरुनानक बोलते थे, यद्यपि अक्षरों का आविष्कार उन्होंने नहीं किया था।

अपनी विशिष्ट भाषा और सशक्त शैली के माध्यम से गुरुजी ने 'जपुजी' में सर्वोच्च सत्य और उसकी सनातन खोज संबंधी उच्च बौद्धिक एवं अमूर्त विचारों को स्पष्ट एवं सशक्त रूप में अभिव्यक्त किया है। विनोबाजी के कथनानुसार ऐसा करना गुरुनानक का आदर्श था। 'जिव होवे फरमाणु' के भाव की व्याख्या करते हुए उन्होंने लिखा है मुझे लगता कि यहाँ संस्कृत और अरबी दोनों अर्थ लेकर शब्दों की रचना की है। आखिर गुरुजी हिंदू और मुसलमानों दोनों को जोचाहते थे, 'सगल जस्माती' करना चाहते थे।
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